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शिवराज प्रधान(UBI अक्षय प्रतियोगिता | सम्मान पत्र)

शिबराज प्रधान।

जीवनाञ्चल मे सजनी सुर सर्वोपरि अक्षय रहे ।
मानसिक वैभवताके भाव सञ्चयन अक्षय रहे.।

उबड खाबड़ जिन्दगी के ये लम्बी यात्रा मे
उतार चढ़ावकी झंझावत भरी कठिन राहोंमे।
सौ-सौ करगुजरियां झेलना पडे सर्वदा
फिर भी शूरता-शौर्यता अक्षय रहे सर्वदा।

दर बदर भटक भी जाये मञ्जिल से
दम पस्त हो,फिर भी अकेलेके भरोसे पे।
मस्त आगे कदम बढ़ाये ही चलते रहे
जेद्दोजेहादकी स्वर स्फूर्त व अक्षय रहे।

ऊँची लक्ष्यकी उड़ान व प्राप्तिकी चाहत
आदर्शमय जीवन धरोहरकी ठोस सत ।
महानताके जीवन शैली सर्वदा आप्लावित रहे
जीवन सर्गमे सर्वदा सौम्य स्वर
अक्षय रहे ।

खोज बरदानकी,तपस्या हो बढे कठिन
चुनौतियां राहों मे खढे मिले प्रतिदिन
निराशाकी घड़ियां,घटाटोप छायी रहे
फिर भी अन्तर आलोक सर्वदा प्रदीप्त रहे ।

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