Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content

ललिता वैतीश्वरन ( जलती वसुंधरा प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र )

क्या सोचा था तुमने जब
काट वृक्ष इतराये थे
जड़ को निकाल फेंक आये
और पथरीली इमारत बनाये थे
शहरीकरण के अहंकार से हजारों जंगल बर्बाद हुये
नर , पशु और हरियाली यूँ झूठमूठ आबाद हुये
जल को अपनी धरोहर समझ बहा बहा कर खत्म किया
अब प्यासे नद औ सागर हुये ज्यों चिराग का बुझता दिया
तुमने सोचा तुम स्वामी हो, है धरा तुम्हारी सम्पत्ति
कभी अन्देशा न हुआ होगा जो आयी वसुधा पर विपत्ति
बूँद बूँद को तरस रहे कहीं सूखा कहीं बाढ़ है
बरस रहे नभ से शोले अब न वो मूसलाधार अशाढ़ है
जंगल जंगल आग लगी है जल रही है ये धरा
वृक्ष लगाओ जल बचाओ तभी जियेगी ये वसुंधरा !

 

0

Leave a Comment

Your email address will not be published.

You may use these HTML tags and attributes:

<a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

×

Hello!

Click on our representatives below to chat on WhatsApp or send us an email to ubi.unitedbyink@gmail.com

× How can I help you?