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ऐ दुनिया

ऐ‌ दुनिया ये तूने क्या कर डाला……
(२x) सुन, कान खोल और मेरी बात मान….
कह रहा है क्या तुझसे इस देश का किसान
आंखो के आंसू खतम हूए निकल रहा अब खून
काहा गई वह हसी मेरे चेहरे की, देदे जरा ढूंड़‌
मैं ही हु वह बदनसीब अनाज उगाने वाला….
ऐ‌ दुनिया ये तूने क्या कर डाला……

(२x) कहने को तो नया सूरज आया, पुरानी रात बिती
फस गया हुं इस दलदल मे केहते है जिसे राजनीती
(२x) इस दलदल मे मैं धसा रहा
और नाकार तू राम मंदिर मे फसा रहा
(२x) काहा था बडा तुने
की होगे तेरे सारे कर्जे माफ,
अरे झुटे मक्कार उतार यह नकाब और करले अपनी शकल साफ
जूठ से होगया है मुह तेरा काला
इस जूठ से नही होगा तेरा बोलबाला
ऐ‌ दुनिया ये तूने क्या कर डाला……

(२x) होगयी है दूरी सारे रिशतो मे
दुनिया चली गई चांद पर,
और मैं फसा रहा किशतो‌ मे
इस जंग मे था मैं अडा, इस जंग मे था मैं लढा
क्यू की मेरे बेटे ने कहा था की
“बापू उठ खेत चल तेरे साथ हुं मैं खडा”
(२x) किसान तो सिर्फ इस कविता का मद्दा है
जिंदा हुआ तो क्या हुआ बस एक जिंदा मुर्दा है
तेरे इन साजिशो ने मुझे हरा ही डाला
ऐ‌ दुनिया ये तूने क्या कर डाला……

(२x) कभी जी भर कर बरसना तो कभी बूंद बूंद के लिये तरस्ना
अरे बडा बेबस है वह वक्त,
जहा मेरे आँखो का रोना और तेरे होठो का हसना
(२x) जमीन पडी रही वह मेरे खेत की अबतक बंजर
खो गई रे इंसान जो थी इंसानियात तेरे अंदर
मेरी मुस्कुराहट, मेरी उम्मीदो, मेरी ख्वाहिशो को तूने हरा ही डाला
ऐ‌ दुनिया ये तूने क्या कर डाला…….

(२x) हाय रे मेरा नसीब, अब आया मिलने कोरोना
अब रो कर क्या फायदा ए गालिब,
हो गया जो था होना
(२x) कामचोर है तू, है तू आल्सी
बडे दिनो से सुना ही नाही मैने वेसे NPR NRC
(२x) अब तो जग, खोल तेरी आँखे
बैठे बैठे बस पढ मत, मार मत इतनी हांखे
क्या खूब बहाने तूने बना ही डाला
ऐ‌ दुनिया ये तूने क्या कर डाला………

(२x) मेरे इन लफजो से इंसान इतना तू चोंक मत
आज जो किसान जी रहा है, उसे जिने से रोक मत
कुछ नाही होगा इस देश का,
जब तक तू बकता रहेगा की “क्या होगा इस देश का?”
खैर, पहना ही दी तूने मेरे गले मे फासी की माला
अखिर कार तूने मुझे मार ही डाला
ऐ‌ दुनिया ये तूने क्या कर डाला…………
ऐ‌ दुनिया ये तूने क्या कर डाला…………

रचनाकार: प्रफुल वसंत जाधव (रा. धानोरी, ता. लोहारा, जि. उस्मानाबाद)

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