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अंजली झा (UBI भीगी पलकें प्रतियोगिता | सहभागिता प्रमाण पत्र )

दबे आँसू

कहते हैं कभी-कभी आँसुओं को दबा कर रखना भी अच्छा होता है तो कभी कभी आँखों से आँसुओं का बहना भी अच्छा होता है ताकि आँसू के निकल जाने से मन हल्का हो जाता है। लेकिन क्या जब कभी आपके आँखों से आँसू निकल रहे हो और आपके पलकें भीगी हो लेकिन आपके आँसू का कद्र करने वाला भी ना हो।
कुछ ऐसा ही विद्या के साथ हुआ जब वह पति के इस दुनिया से चले जाने के बाद भी अपने बेटे के परवरिश में कोई कमी नहीं की। उसके हर एक जरूरतों का ख्याल रखा। उसे कभी किसी भी चीज की कमी ना होने दिया। उसे बड़े ही लाड़-प्यार से पाला पोसा। उसे अच्छे स्कूल में डालकर अच्छे से पढ़ाया लिखाया। भले ही उसे अपने पेट के लिए दो जुन की रोटी जुटाने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ रही थी। वह अपने दिल के अंदर ही बातों को दबा कर रख रही थी। इसी तरह समय बीतता गया और उसका बेटा भी बड़ा हो गया। वह पढ़ लिखकर बड़ा तो हो गया, लेकिन उसे व्यवहारिक और सांसारिक ज्ञान कभी नहीं आया। जिस मां ने उसके लिए इतना कुछ किया उसके लिए उसने कुछ नहीं सोचा। पढ़ाई पुरा होते ही उसे नौकरी भी मिल गई और लड़की भी। अब उसका दुनिया ही बदल चुका था। वह अब सपनों के दुनिया में जी रहा था। उसे अब अपने मां का थोड़ा भी परवाह न था। वह अब घर भी आना जाना कम कर दिया था। मां जब बहुत कहती तो वह झल्ला उठता था। अंत में उसने मां से एक दिन कह ही दिया मां मैं अब रीतिका से शादी करने जा रहा हूँ। मां बेटे के अचानक ये विचार सुनकर शांत हो गई। लेकिन अब उसके हाथ में कुछ न था। एक दिन बहु ने अपने सास को घर से निकाल दिया। मां ने बेटे से शिकायत की तो उसने भी अपनी पत्नी का ही पक्ष लिया। फिर क्या था मां ने अपने घर और अपने बेटे को छोड़कर चल दिया। उसकी आँखें तो आँसुओं से भरे थे लेकिन बस भीगे पलकें ही अब उसका सहारा था।

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