“पिता”

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शालीन सिंह

आज भी देखा है मैंने पिता को
शाम को कंडिया लेकर
शनिवार के रोज़
कट्टे के थैले में
हमारे लिए खिलौने लाते हुए
पहले छुपाते सकुचाते
बाद में हल्के से मुस्कुरा के दिखाते हुए
हम हमेशा की तरह निराश हैं
खिलौने कम पड़ गए हैं हमे
हमने स्कूटर मांगा था
आयी है कार हमे…
अभी कल की ही बात है
उनको देख रहा हूँ
बिस्तर पर लेता हुआ
उनके पैर दबाता हुआ मैं
कब उनके पैताने सो जाता हूँ
कितनी बजे रात के
पता ही नही चलता….
याद बार बार आता है
कल का ही वो वाकया
जब एक शाम कुछ लोग उन्हें
रिक्शे पर लाये थे
कुछ खरोंचे थी उनके
कोट पर एक दो छिलन के
निशान भी थे,
हमे समझ ही नही आया
पिता गहरी गुम चोट
लिए थे सिर में
अगले दिन जब डॉक्टरों ने
रेफर किया मेडिकल कॉलेज को
तो मुझे कई दिनों बाद पता चला
उनका 6 घण्टे आपरेशन चला था
और वे सातवें दिन होश में आये थे
ये कल की ही बात है
हमने देखा उन्हें
अपनी ज़िन्दगी को
अपने ही एक कंधे पर
बिठाए हुए और एक कंधे पर हम सबको
ढोते हुए बड़े साहस के साथ
हमें लगा वे हमें उफनती नदी
से तैर के पार लगा रहे हैं
ये कल ही हुआ
फिर एक रोज़
एक सुबह उन्होंने
फ़ालिज पड़ने पर भी लगातार
एक हाथ से डॉक्टर के यहां
जाने से पहले
पैंट पहनने की
कोशिश की, हमेशा की तरह
जिद में हमेशा जीत जाते थे
बस ये बड़ा पुराना लगता है
कि उन्होंने कब आंखे
बन्द कर लीं
ऐसा सोए कि अब तक नही उठ रहे
मेरी गोद में
अस्पताल से लेकर
घर तक
यही याद नही पड़ता ठीक से
वो सोए थे या जागे
ठीक से याद ही नही आता
उन्होंने ठीक किस वक़्त
आंखें बन्द की थीं अलसुबह कितने बजे
बड़ी पुरानी लगती है ये बात
बड़ी कोशिशों के बाद भी याद नही आती
लगता है एक सदी गुज़र गयी
उनको नींद में गए हुए….

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