ठहराव

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मनप्रीत (बोस्की)

ठहरे हुए पानी में जैसे थोड़ा बहाव ज़रूरी था,
भागती दौड़ती इस ज़िदगी में थोड़ा ठहराव ज़रूरी था,
ज़रूरी था कि हम अपने अंतर्मन को जानें,
ज़रूरी था कि हम शब्दों को समझें, रंगों को पहचानें,
ज़रूरी था कि सीख पाए पढ़ना चेहरे के हाव-भाव,
हाँ ज़रूरी था कि कर पाए ज़िन्दगी का मोल-भाव,
ज़रूरी था कि अपनी ही धड़कन की धक-धक सुन पाएँ,
ज़रूरी था कि बाँटें खुशियाँ और साँझा दुख कर पाएँ,
ज़रूरी था कि दोहरा पाएँ इक बार फिर बचपन की यादें,
ज़रूरी था कि सीख पाएँ पार करना कोरोना जैसी बाधाएँ,
अग्निपरीक्षा के इस समय में, भूलें हुए योध्दाओं का सम्मान ज़रूरी था,
हाँ भागती दौड़ती इस ज़िन्दगी में थोड़ा ठहराव ज़रूरी था..

Copyright© मनप्रीत (बोस्की)

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