” मुझे भी जीने का हक है” (UBI हिन्दी लघुकथा प्रतियोगिता |तीसरा स्थान)

” मुझे भी जीने का हक है” (UBI हिन्दी लघुकथा प्रतियोगिता |तीसरा स्थान)

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अंजली झा

रोहिणी का विवाह दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत इंजीनियर विहान से सन् 2015 में हुआ था । दोनों इंजीनियर थे । रोहिणी के माता – पिता को उसके लिए लड़का ढ़ुढ़ने में कोई परेशानी नहीं हुई क्योंकि दोनों एक दूसरे को जानते थे । हाँ लेकिन विहान के माता – पिता काफी पुराने विचारधारा के लोग थे । वह अपने बेटे के लिए ऐसे बहू ढ़ुढ़ रहे थे जो सभी गुणों से संपन्न हो । लेकिन रोहिणी विहान को भी और उसके माता – पिता को भी पसंद थी । इसलिए दोनों का विवाह अच्छे से संपन्न हो गया । दोनों के जिंदगी में सब कुछ सही चल रहा था ।

इसी तरह समय बितते चला गया और दो साल कब बीत गया , पता ही नहीं चला। शादी का दुसरे वर्षगांठ के दो महीने बाद एक दिन अचानक रोहिणी का तबीयत बिगड़ गया। डॉक्टर के पास ले जाने के बाद पता चला , वह अब मां बनने वाली है । इतना पता चलते ही यह बात जंगल की आग के जैसे सबको पता चल गया । सबका खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। मां बनने की खुशी और पिता बनने की खुशी से रोहिणी और विहान फुले नहीं समा रहे थे। दोनों पेट में पल रहे बच्चे के लिए तरह – तरह के सपने संजो रहे थे। नानी बच्चे के लिए अभी से ही स्वेटर बुन रही थी । नाना – दादा बच्चे का नाम खोजने और रखने के लिए व्याकुल थे।

लेकिन ये सब खुशियां कभी – कभी ज्यादा देर नहीं रहती। अभी रोहिणी के मां बनने में पाँच महीनें बाकी था। लेकिन उसके सास- ससुर अपने पुराने रीति रिवाज और समाज के सारे कुरुतियों का अभी भी पालन करते थे। रोहिणी की सास नहीं चाहती थी कि उनकी बहू पहली बार में भी कन्या संतान को जन्म दे। इसलिए वह अपने पति से और बेटे से कहकर रोहिणी के पेट में पल रहे बच्चें का लिंग परीक्षण करवाना चाहती थी। पहले तो इसके लिए विहान मना कर दिया । लेकिन वह मां के जिद के आगे कुछ ना कर सका । वह भी मां का आज्ञाकारी बेटा था। इसलिए वह रोहिणी को लेकर अस्पताल जाने को तैयार हो गया।

पहले तो रोहिणी इसके लिए तैयार नहीं थी । लेकिन घर में सबके दबाव के कारण वह जाने को तैयार हो गई। लिंग परीक्षण के बाद डॉक्टर ने बच्ची होने का दावा किया। इतना सुनते ही बस क्या था रोहिणी की सास कन्या भ्रूण हत्या करने को भी तैयार हो गई। रोहिणी के रोने- चिल्लाने का भी अब घर में कोई असर नहीं हुआ। उसे शक हुआ कहीं विहान रोहिणी के ना करने पर उसे लेकर वापस ना चले आये । इसलिए वह खुद उसे अस्पताल लेकर चली गयी। वहाँ जाने के बाद डॉक्टर ने रोहिणी का हालत देखकर ही भ्रूण हत्या ना करवाने की सलाह दी । लेकिन पुराने सोच में जीने वाली और लड़के की चाह रखने वाली तनिक भी नहीं सोच रही थी वह जो कदम उठाने जा रही है , उसका क्या परिणाम होगा। अंततः डॉक्टर ने भी रोहिणी के पेट में पल रहे बच्चे को मार ही दिया। रोहिणी तो अब तक बेहोश हो चुकी थी । उसे तो बस सुई पड़ने तक की की देर थी , उसके बाद उसके साथ क्या हुआ , उसे कुछ पता ही नहीं चला। डॉक्टर के बाहर निकलते ही विहान की मां डॉक्टर को धन्यवाद दिया। लेकिन उसे भी क्या पता था , अब जो आगे होने वाला है ,वह अभी जो हो रहा है उससे भी भयावह होने वाला है।

दो घंटे बाद डॉक्टर को आकस्मिक निरीक्षण के लिए बुलाया गया । डॉक्टर ने जब कारण जाना तो उसके भी रोंगटे खड़े हो गए। शरीर से अत्यधिक खुन जाने की वजह से रोहिणी का हालत बहुत नाजुक हो चुका था। उसे आईसीयू में भर्ती किया गया। लेकिन डॉक्टर ने बहुत कोशिश करने के बाद भी उसे बचा ना सका। कुछ ही देर में उसने दम तोड़ दिया। उसके मौत की खबर सुनते ही उसके सास के होश उड़ गए। लेकिन अब हो ही क्या सकता था , जो होना था , वह तो अब हो चुका था। अज्ञानता में उठाया गया कदम ने एक हंसते- खेलते परिवार को उजाड़ दिया।

रोहिणी की मौत की खबर आंधी की तरह फैल गया। तुरंत उसके माता पिता भी आ गये।

किसी ने यह खबर पुलिस के कानों तक पहुंचा दी । अब पुलिस लाश को भी अपने कब्जे में कर लिया। अंत्यपरीक्षण के बाद पुलिस ने लाश विहान के घर वालों को सौप दिया । लेकिन अंत्येष्टि के बाद उसके परिवार के साथ-साथ डॉक्टर को भी सलाखों के पीछे कैद होना पड़ा।

अब सब जेल के अंदर बैठे-बैठे खुद को और अपने किस्मत को कोश रहे थे। उन्हें यह नहीं पता था , जो गलती उन्होंने किया है भला उसके पीछे उनके किस्मत का क्या काम है। यह तो खुद से लगाया हुआ आग है , जिसके लपेटों में सबको जलना है ।

आखिर पेट में पल रहे उस बच्ची की गलती थी , जिसने अपने आँखों से दुनिया भी नहीं देखी थी । जिसने अपने कानों से अभी दुनिया में हो रहे शोर को भी नहीं सुनी थी। आखिर ऐसा उसने क्या गुनाह किया था , जिसके लिए उसे अपने मां के मौत का भी कारण बनना पड़ा। रोहिणी की भी क्या गलती थी , जिसके वजह से उसे ऐसी सजा मिली ।”कोख में पल रहे कन्या भ्रूण से क्यों है इतनी दुरी ,

बेटी के जन्म का अधिकार छीनने की कैसी है मजबूरी ,

बेटियों को इसी तरह मारते रहोगे तो याद रखना ,

बेटे के लिए फिर बहु कहाँ से लाओगे “।अगर सब यहीं सोचेंगे , बेटी शाप बनकर आती है , बेटी बोझ बन जाती है । तो फिर बेटी नहीं होगी तो कोई बहू भी नहीं होगी , अगर सबका यहीं सोच रहेगा तो दुनिया में लड़के के लिए लड़कियाँ कहाँ से आयेगी। ऐसा हमारे देश में ही क्यों होता है , जहाँ नारी की पूजा की जाती है, उसी देश में मां के कोख में पल रही एक नन्हीं सी जान सुरक्षित नहीं है । बाहर तो हर दिन महिलाएं कभी दहेज के लिए प्रताड़ित की जाती हैं , कभी लड़कियां दुष्कर्म की शिकार हो जाती हैं। कहने को तो घर से बाहर तक सुरक्षित नहीं ही थी , लेकिन अब अजन्मी बच्चीं भी मां के कोख में सुरक्षित नहीं है। कभी वह मां के द्वारा ही मार दी जाती है , कभी सबके इरादे से। ऐसा क्यों हमेशा लड़कियों के साथ ही होता है । समाज के लोग अब भी ये क्यों सोचते हैं , हर काम बस लड़के ही कर सकते हैं , लड़कियां नहीं कर सकती । क्या उन्हें नहीं पता आज के युग में जो जिम्मेदारी लड़के निभाते हैं, वो लड़कियाँ भी बखुबी से निभाती है। चाहे वह रेल की चालक हो या फाईटर प्लेन की । हर जगह लड़कियां लड़कों को पीछे छोड़ रही हैं। फिर इतना भेदभाव क्यों है । लड़कियां घर की इज्ज़त होती हैं , तो क्या आपको अपने इज्ज़त का ख्याल रखने में कोई कठिनाई होती है। अगर ऐसा है तो आप घर की बाकी जिम्मेदारी कैसे निभाते हैं। या फिर लड़कियों के शादी में लगने वाले खर्च जैसे दहेज देने के कारण आप उन्हें मारना चाहते हैं। आखिर दहेज प्रथा भी तो समाज के लोग ही शुरू किये हैं । अगर आप दहेज देने से डरते हैं , तो दहेज लेने से भी डरिये ना । एक तरफ कन्या रुपी भगवती की पूजा अर्चना करते हैं , दुसरे तरफ वहीं निर्दोष कन्या की जन्म लेने से पहले ही हत्या कर दी जाती है। उनका जीने का अधिकार छीन लिया जाता है। इतना निर्ममता से हत्या कर दी जाती है , उस बच्ची की जिसने अभी तक दुनिया नहीं देखी है । ऐ दुनिया वालों सुनों एक बच्ची की पुकार जिसने अभी मां के कोख से बाहर नहीं निकली है , लेकिन उसे हर वक्त डर रहता है ,कब उसे मां के कोख में ही मार ना दिया जाये । वह तो मां के कोख में भी अब सुरक्षित नहीं है । वह तो दुनिया में आने से भी अब डरती है , कब उसे मार दिया जायेगा , कब उसे किसी बेरहम इंसान के हाथों सौंप दिया जायेगा । यह सब भी कोई अजनबी बात नहीं है , सच में कई बार लोग बेटी को जन्म देकर उसे अस्पताल में ही छोड़ चले आते हैं । यह स्थिति हमारे देश की है । उस देश की जो कहने को तो स्वतंत्र है , लेकिन यहाँ की बेटी अब भी यहाँ के कुरीतियों की बंधन से मुक्त नहीं हुई हैं।

एक बेटी के तरफ से इस देश को , इस देश की बेटी की मां को , इस देश में बेटी को बुरी नजर से देखने वालों को संदेश :–

” देश तुम कहने को तो आजाद हो ,

फिर क्यों तुम्हारे ही देश में कैद हैं” ।”मां , मोम सा कोमल मन तेरा , कैसे पत्थर का हो गया ,

अभी तेरे कोख में आयी ही थी , फिर कैसे मेरा वध हो गया ,

पिताजी आप थे दयालु , फिर कैसे मेरा गला घोंट दिया ,

मां तुने मुझे खुन से सींचा , क्या मैं वह क्यारी ना थी ,

होगी सबको बेटे की आस, क्या मैं तुझको प्यारी ना थी”।

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