सुशीला गंगवानी । (विधा : लघु कथा) (धोखा | प्रशंसा पत्र)

सुशीला गंगवानी । (विधा : लघु कथा) (धोखा | प्रशंसा पत्र)

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सुशीला गंगवानी

राम लाल एक छोटे से गांव में अपने परिवार के संग रहते थे।उनके परिवार में उनकी पत्नी पार्वतीबहन,सत्रह साल की उनकी बेटी और एक उनका छोटा भाई रहते थे।अपने भाई शामू को वोह अपने बेटे की तरह संभालते थे।पार्वतीबहन भी शामू को सिर्फ अपना छोटा देवर ना समझकर एक बेटा ही मानती थी। शामू भी अपनी भाभी मांँ की बहुत इज्ज़त करता था।राम लाल की अपनी छोटी सी ज़मीन थी जहांँ वोह खेती का काम करके अपने परिवार का गुज़ारा करता था।पिछले तीन साल से बारिश बहुत कम हुई थी सो घर के आर्थिक हालात भी बहुत तंग थे।भगवान की दया से इस साल बारिश अच्छी हुई थी फसल भी बहुत अच्छी रही सो रामलाल और पार्वतीबहन बहुत खुश हुए की अब के साल अगर यूंँही सब ठीक ठाक रहा तो छोटे भाई की यानी शामू की शादी कर देंगे फिर आखिर वोह अच्छा दिन भी अा गया शामू की शादी पास के गांव की एक लड़की से कर दी गई।शामू की घरवाली स्वभाव से बहुत ही जलनखोर और क्रोध वाली थी ज़रा ज़रा बात पर अपनी जेठानी से लड़ पड़ती।उसे शामू का अपने भैया भाभी के साथ उठना बैठना या बात करना बिल्कुल पसंद नहीं था।धीरे धीरे छोटी बहू ने अपने पति को उल्टी सीधी पटी पढ़ाकर परिवार वालों से अलग कर दिया अब वोह दोनो इस घर से थोड़ा दूर अलग रहने चले गए राम लाल और पार्वतीबहन को इस बात का बहुत सदमा लगा।खैर समय बीतता गया,शाम ने अपना अलग छोटा सा काम भी ढूंढ़ लिया था।सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन शाम की पत्नी ने वापिस पति को उल्टी सीधी बातों में बहकाकर ना जाने क्या क्या समझाया की हम यहांँ मज़दूरी कर रहे हैं वोह लोग खेत पर घर पर राज कर रहे हैं ।तुम हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहना खेत में से तुम्हारा हिस्सा भी तुम्हे नहीं मिलेगा।रोज़ की पत्नी की बातें सुनकर शामू का दिमाग भी गुम गया था।एक दिन राम लाल उसके परिवार के साथ गहरी निंद्रा में सो रहे थे इतने में आस पास वाले शोर मचाने लगे कि “उठो उठो राम लाल तुम्हारा खेत तो जल रहा है।” सुनकर राम लाल हक्का बक्का रह गया सब लोग दौड़ कर गए देखा तो पूरा खेत जलकर राख हो गया था किसी ने अपनी ज़ाती दुश्मनी की वजह से ऐसा किया था।पार्वतीबहन ने कहा “अरे कोई शामू को तो बुलाओ यह सब क्या हो गया? हम तो बर्बाद हो गए।” शामू भी आया बाद में तहकीकात करने पर पता चला कि यह घिनौना काम तो सगे भाई शामू का ही था जो उसने भाई के प्रति द्वेष में आकर किया था ।रामलाल को अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि छोटा भाई उनके साथ ऐसा धोखा कर सकता है।रामलाल ने शामू से कहा “अरे पगले तुमने यह क्या कर दिया? मेरे प्यार और विश्वास का यह फल दिया मुझे अगर तुम्हे मुझ से कोई तकलीफ़ थी तो मुझसे कहते यूं धोखा तो ना देते।” एक स्त्री हठ और ईर्षा ने कितना नीचा काम करवाया था शामू से।यह सब सोचकर रामलाल बहुत आघात में अा गए थे। धोखा करने वाले ना रिश्ते देखते हैं और ना ही किसी की परिस्थिति।

स्वरचित –
सुशीला गंगवानी

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