सीमा अग्रवाल जैन (UBI रूह का सफर प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र)

सीमा अग्रवाल जैन (UBI रूह का सफर प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र)

299
(No Ratings Yet)
image

सीमा अग्रवाल जैन

रूह चादरें बदलती रही , जिस्म साँसो में बंध गया,
ज़िंदगी ख़्वाहिशों की चाह में , कब गुज़र गया ,
कब बीज डाला था , कब व्रक्ष बन गया ,
बिन फल आए हुए ही, ना जाने कब कट गया ,
साँसो की ये माला ,कब ज़िम्मेदारीयो में गुथ गयी ,
साँसो के रुकते ही , माटी में मिल गयी ,
घट जाए जो नित्य प्रति , ज़िंदगी कहलाएगी ,
अलविदा कह कर , किस रूप में मिल पायेंगी ,
मूक माटी की ये काया , माटी में मिल जायेंगी ,
अजर – अमर रूह तो पुनः नयी काया पायेगी
पुनः नयी काया पाएगी ……….
चलता रहेगा ये कारवाँ अनवरत चिरकाल ,
बस चेहरे बदलते रहेंगे , आएगा जब भी काल
आएगा जब भी काल ………..

Leave a Comment

Your email address will not be published.

You may use these HTML tags and attributes:

<a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

×

Hello!

Click on our representatives below to chat on WhatsApp or send us an email to ubi.unitedbyink@gmail.com

× How can I help you?