श्वेता प्रकाश कुकरेजा । (विधा : लघुकथा) (ग्रहण | सम्मान पत्र)

श्वेता प्रकाश कुकरेजा । (विधा : लघुकथा) (ग्रहण | सम्मान पत्र)

56
1
image

श्वेता प्रकाश कुकरेजा

आज सिम्मी बारह साल की हो गयी…..वक़्त कैसे गुज़ार गया समझ ही नही आया….कोरोना संकट ने उससे उसकी बहन शिखा और सिम्मी से उसकी माँ का आँचल छीन लिया।जब शिखा अस्पताल में थी अपने अंतिम समय में कुछ पत्र लिखे उसने सिम्मी के लिए।जाते जाते वो उसे थमा गयी थी।

आज आखिरी पत्र है जो वो सिम्मी को देगी।“मेरी लाड़ो को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं, ईश्वर मेरी उम्र भी तुम्हे दे दे।“सिम्मी का माथा चूमते हुए वो बोली।“नही मासी माँ आपकी उम्र नही चाहिए,आपका साथ चाहिए हमेशा के लिए।“गले लग सिम्मी बोली।उंसके आंखों से आंसू निकल आये….उसने सपने में भी न सोचा था कि जीवन में कभी उसे कोई सुख भी मिलेगा ।उसने सिम्मी को पत्र दिया “अपनी माँ का ये आखिरी पत्र है सिम्मी तुम्हारे लिए।“उसे देकर वो चली गयी।

सिम्मी ने भी झट पत्र खोला….उसे जन्मदिन का इंतजार इसलिए ही रहता था,

“मेरी प्यारी बिटिया आज बारह साल की हो गयी।मैं औऱ पापा यहां से हमेशा तुम्हे ही देखते रहते है।आज कुछ बताना चाहती हूँ अपनी समझदार बिटिया को…जब मैं पैदा हुई तो मेरी माँ चल बसी।मेरी जिम्मेदारी मेरी नन्ही सी दीदी पर आ पड़ी।उनका स्कूल भी छूट गया…बेचारी नन्हे हाथो से मुझे संभालती औऱ बाबा का काम भी करती।मैं गोरी थी और दीदी साँवली….हर कोई मुझे चाहता।दीदी कुछ न कहती….बस मेरा ध्यान रखती माँ की तरह।पर उनका सब्र का बांध उस दिन टूट गया जिस दिन तेरे पापा हमारे घर आये।वे दीदी को देखने आए पंर उन्हें मैं पसंद आ गयी।दीदी टूट गयी….बहुत रोई बोली शिखा तूने ग्रहण लगा दिया मेरे जीवन पर…मेरी पढ़ाई, मेरा बचपन और अब मेरे ब्याह पर भी….सच ग्रहण है तू।और सच तब एहसास हुआ जाने अनजाने सच में मेरी वजह से दीदी का कितना कुछ छिन गया।उन्होंने कभी शादी नही की और में इसी ग्लानि में कभी उनसे मिली नही।आज ईश्वर ने मुझे मौका दिया है उस ग्रहण को हटाने का।सिम्मी अपनी मासी को माँ समझ के प्यार करना।मेरे ऊपर लगा कलंक तुम्हे ही हटाना है सिम्मी….अपनी मासी के जीवन पर लगा ग्रहण अपने प्यार से हटा देना सिम्मी।अब वो ही सब कुछ है तुम्हारी…
असीम स्नेह
तुम्हारी माँ।“

सिम्मी फ़ूट फूटकर रो रही थी….दौड़कर सिम्मी उनके गले लग गयी,”माँ”
“अरे क्या हुआ मासी माँ से आज माँ कैसे?”उसने पूछा
“मासी शब्द का जो ग्रहण था न आज उसे हटा दिया माँ….सही किया न माँ?”सिम्मी गले लग गयी…मन ही मन अपनी माँ को वचन देती हुई।

©श्वेता प्रकाश कुकरेजा

Leave a Comment

Your email address will not be published.

You may use these HTML tags and attributes:

<a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

×

Hello!

Click on our representatives below to chat on WhatsApp or send us an email to ubi.unitedbyink@gmail.com

× How can I help you?