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श्याम सुन्दर शर्मा। (विधा : लघुकथा) (बर्फीली शामें | सम्मान पत्र )

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श्याम सुन्दर शर्मा

रमेश भंडारी बड़े हँसमुख व मिलनसार हैं। पिछले वर्ष बैंक से सेवा निवृत्ति हुए। सारा जीवन मुंबई की प्रदूषित पसीने भरी शामों को कोसते रहे। जब से बेटी आराध्या व दामाद निखिल नॉर्वे में जा बसे हैं पत्नी मैथिली के साथ वहां की रोमांटिक बर्फीली शामों का लुफ्त उठाने के सपने आँखों में सजा रहे हैं। दोनों के पासपोर्ट बन गए। अब केवल विसा बनकर आने का इंतजार है। रमेश सुबह टहल कर लौटे। कई डोर बेल बजाने पर भी मैथिली ने दरवाजा नहीं खोला तो पड़ोस के वर्माजी के यहाँ रखी डुप्लीकेट चाभी से घर खोला। मैथिली तो खड़की के पास सोफे पर हाथ में अख़बार लिए बैठी उन्हीं की ओर देख रही हैं!! क्षण भर के लिए उन्हें क्रोध आया कि मैथिली ने दरवाजा क्यों नहीं खोला? दूसरे ही क्षण उन्हें समझ अा गया कि वह तो मूर्ति की तरह स्तब्ध है। जल्दी से पास जाकर रमेश ने जांच की तो पाया कि हृदय और सांस थम चुके हैं…
पड़ोस के डॉक्टर शेख ने जांच करके मैथिली को मृत घोषित कर दिया। नित्य भरतनाट्यम का अभ्यास करने वाली मैथिली छरहरी व रमेश से कहीं अधिक स्वस्थ व चपल थीं। उनसे पहले वह? कैसे?? रमेश तो जैसे सकते में अा गए!!! पुत्र अनीष जो पढ़ाई के लिए टेक्सास में था परीक्षाओं के कारण ना अा पाया। भतीजे गौरव के हाथों अंतिम संस्कार हुआ। आराध्या व निखिल नॉर्वे से चौथे दिन पहुंचे व मनोचिकित्सक के परामर्श अनुसार रमेश को अपने साथ नॉर्वे ले आए।
नार्वे में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। ग्यारह बजे भोर होती है तथा तीन बजे दिन ढल भी जाता है। दो दिन आराध्या छुट्टी लेकर रमेश के साथ टहलने गई। तीसरे दिन काम पर जाते हुए पापा से टहलने को जाने के कहा। सूर्यास्त के घंटे भर पहले फोन करके फिर याद भी दिलाया।
रमेश को अब जीवन बोझ सा प्रतीत हो रहा था। आराध्या ने अपने सर की कसम ना दी होती तो वे आज कहीं ना जाते। उनका मन जैसे बर्फ की तरह जम गया था। कल रात को सोते समय रमेश ने अश्रुपूरित नैनों से गणेश जी से मूक प्रार्थना की कि उन्हें भी मैथिली के तरह अपने पास ही बुला लें।
बाहर हल्की बर्फबारी हो रही है तथा अद्भुत सा नीला प्रकाश छाया था। आदतन कानों में इयरफोन पर रमेश किशोर कुमार के रोमानी गीत लगाए चला जा रहा है। उसका ध्यान ना गीत पर ना दृश्य पर। आंखों के सामने मैथिली के चेहरे के अन्तिम शांत निर्लिप्त भाव तैर रहे। यह तंद्रा तब खंडित हुई जब किसी ने पीछे से कंधा थपथपाया। वह अनीता राघानी थीं तथा इयरफोन पर बज रहा गीत सुनना चाहती थीं। रमेश ने अनमने भाव से एक प्लग उन्हें दे दिया और दोनों साथ चलने लगे। कई गाने सुने। फिर दोनों में बातें हुईं। अनीता लेखिका हैं उनके लिखित पाँच उपन्यास छप चुके हैं। हिंदी फिल्मों तथा फिल्मी संगीत का शौक है। पंद्रह मिनट चलने के बाद वे एक बाग में पहुंचे। वहाँ उन्हीं की आयु की तीन महिलाएं और चार पुरुष पहले से उपस्थित थे। अनीता ने सभी से परिचय करवाया। वे सभी भारतीय, भांति भांति की भाषाएं बोलने वाले हैं। सभी रमेश जैसा ही एकाकी जीवन जीने को बाध्य। यहाँ अपने काम काजी बच्चों के साथ रहते हैं। एक दूसरे के एकाकीपन को मैत्री भाव से भर रहे हैं। रमेश सभी के साथ सहज होता चला गया । अनीता ने लौटते हुए सभी को कॉफी पीने के लिए अपने घर आमंत्रित किया। ढलती बर्फीली शाम रमेश को सुबह सी प्रतीत हो रही थी!
©श्याम सुन्दर शर्मा

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