शीतल प्रधान देशपांडे । (विधा : लघु कथा) (धोखा | सम्मान पत्र)

शीतल प्रधान देशपांडे । (विधा : लघु कथा) (धोखा | सम्मान पत्र)

28
7
image

शीतल प्रधान देशपांडे

पूजा तवे पर परांठे सेक रही थी..सबको नाश्ता खिला रही थी।सुबह से उसकी भागदौड़ शुरू हो जाती थी। तभी उसकी सासुमाँ , विमलाबेन रसोईघर में आई ,”कितना काम करेगी.. चल अब तू बैठ जा मैं तेरे लिए गर्मा गर्म परांठे सेकती हूँ।”” नहीं माँजी में कर लुंगी।” विमलाबेन ने उसका हाथ पकड़कर उसे बिठा दिया, और उसके लिए परांठे लायी.. “ले, तेरे लिए ज्यादा घी लगया है.. मेरी लाडो मेहनत जो इतना करती है! ”
पूजा के मन में बहुत बार ये खयाल आता था कि जरूर उसने कोई पूण्य का काम किया होगा जो उसे इतने अच्छे लोग मीले वरना एक बिन माँ बाप की बच्ची को इतना प्यार कहाँ मिलता है। उसके ताऊजी ने ये रिश्ता जोड़ा था। उन्हीं की वजह से उसे मनीष जैसा जीवनसाथी मिला था।
जब से पूजा को अपने माँ बनने की खबर मिली थी तब से विमलाबेन उसे अपने पलकों पर बिठा कर रखती थी.. उसे कोई काम नहीं करने देती और उसके खाने पीने का भी विशेष ध्यान रखती थी।
देखते देखते नौ महीने बीत गए और पूजा ने एक बेटे को जन्म दिया। कुछ ही दिनों में मनीष का शहर में तबादला हुआ। अब तो पूजा और उसकी सास ही गाँव में थे.. विमलाबेन ने कहा कि इतने छोटे बच्चे को शहर ले जाना ठीक नहीं। दो तीन महीने के बाद चले जायेंगे।
पूजा की नींद खुली .. “आज इतनी देर तक..कैसे सोई मैं, माँजी तो काम पर लग लगी होगी,मुन्ना भी उन्हीं के पास होगा। पूजा जल्दी जल्दी बाहर आई, घर पर कोई नहीं था। उसे समझ नहीं आया.. आखिर माँजी मुन्ने को लेकर कहाँ गई ?”
उसने देखा के उसके ताऊजी कमरे में लेटे हुए थे। “ताऊजी आप कब आये और माँजी और मुन्ना कहाँ है?”
“बेटा आज से ये घर हमारा। अब तू सब कुछ भूल जा।” “मतलब?”
“येही तो तय हुआ था”।ताऊजी जोर जोर से हँसने लगे।”तुझे क्या लगा.. तुझ जैसी लड़की को इतना अच्छा घर कैसे मिला।
अरे पगली!मैंने विमलाबेन से एक छोटासा सौदा किया था।”
“ताऊजी आप क्या बात कर रहे है..मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।” ” अच्छा सुन मैं समझता हूँ, विमलाबेन की बहू को बच्चा नहीं हो रहा था..और मनीष अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता है.. किसीभी हालात में उसे छोड़ना नहीं चाहता है। इसलिए विमलाबेन ने ये तरीका मेरे सामने रखा.. बच्चा होने के बाद तुम्हारा, उनसे या बच्चे से कोई नाता नहीं रहेगा। शादी तो वैसे भी झूठ मूठ की कराई थी तुम्हारी.. इसलिए कानूनी तौर पर तुम्हारा कोई हक नहीं बनता उनपर। आज भी मनीष की पत्नी का ही कानूनी तौर पर उसपर अधिकार है।बच्चे के जन्म के समय भी हर जगह माँ बाप के नाम के जगह पर रीमा और मनीष का ही नाम लिखा है। बदले में उन्होंने मुझे ढेर सारा पैसा और ये घर दे दिया। हुआ ना फायदे का सौदा। अब हम दोनों को पैसे की कमी कभी महसूस नहीं होगी। चल मेरे लिए खाना बना, जोर की भूक लगी है।
ताऊजी की बातें सुनकर पूजा का कलेजा फट चुका था, वो जीते जी मर चुकी थी। ये सब उसके समझ के बाहर था…। इतना धोखा .. शायद ही किसीने अपनों के साथ किया होगा! ताऊजी को तो वो अपने पिता समान मानती थी..!!
दो साल से वह जिन लोगों की दिलोजान से सेवा कर रही थी वो सब उसे धोखा दे रहे थे! मनीष का प्यार एक धोखा था.. माँजी का प्यारसे उसका खयाल रखना भी एक धोखा था!!
पूजा की आँखों के सामने अंधेरा छा गया और वह जमीन पर गिर गई।

✍️शीतल प्रधान देशपांडे

4 Comments on “शीतल प्रधान देशपांडे । (विधा : लघु कथा) (धोखा | सम्मान पत्र)

Leave a Comment

Your email address will not be published.

You may use these HTML tags and attributes:

<a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

×

Hello!

Click on our representatives below to chat on WhatsApp or send us an email to ubi.unitedbyink@gmail.com

× How can I help you?