शीतल प्रधान देशपांडे। (विधा : लघुकथा) (एक दुल्हन के सपने | प्रशंसा पत्र)

शीतल प्रधान देशपांडे। (विधा : लघुकथा) (एक दुल्हन के सपने | प्रशंसा पत्र)

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शीतल प्रधान देशपांडे

सिमरन अपने आप को आईने में निहार रही थी..आज तो बहुत खूबसूरत लग रही थी वो। सच में,कितना खुश होगा राजेश उसे देखकर!मन ही मन शर्मा रही थी। राजेश और उसके परिवार से वह तीन महीने पहले मिली थी। दोनों परिवारों में बातचीत हुई और सबकी रजामंदी के बाद शादी तय हुई। “A typical Indian Arranged Marriage” आज उसके सारे सपने सच होने जा रहे थे… राजेश में वो सारी खूबियाँ थी जो वो अपने पति में देखना चाहती थी। सिमरन अपनी आँखें बंद कर राजेश के साथ अपने नए जीवन के सपने देखने लगी..” कितना प्यार करता है राजेश मुझे.. बस अब मेरे जीवन में सुख ही सुख होगा।”
सबकुछ उसकी मर्जी से हो रहा था.. फिर आज इतनी उलझन क्यों? सिमरन के विचारों का पहिया तेजी से घूमने लगा…
“आज तक जिसे जिसे मैंने अपना माना, मेरे माता पिता,मेरा घर ..हर वो चीज़ जिससे में जुड़ी थी.. आज वो मुझसे छूटने वाली थी,और मुझे एक नए घर में कदम रखना है.. नए लोगों के बीच क्या ये आसान होगा?बिल्कुल नहीं! लेकिन मुझे एक आशा की किरण नजर रही थी..मेरा राजेश!! मैंने उसे अपना जीवन साथी चुना है,वह हर पल मेरा साथ देगा,उस नए माहौल में भी मेरा ख्याल रखेगा।मैं तो अपनी पूरी जिंदगी उसके हवाले करने जा रही हूँ। पर क्या वो मेरी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा? और अगर ऐसा नहीं हुआ तो…मुझे तो सोचकर भी डर लग रहा था।
तभी पंडितजी की आवाज की तरफ मेरा ध्यान गया..”कन्यादान के लिए कन्या के माता पिता को बुलाइये”..औए कन्यादान की रस्म शुरू हुई। कितनी अजीब रस्म! अपने कलेजे के टुकड़े का दान(??) कई सारी विचारधाराएं मेरे मन में कोहराम मचाने लगी…मैंने पापा को देखा… मुझे दान करते वक़्त उनकी आँखों में आया सैलाब मुझे साफ नजर आ रहा था। मम्मी के आँसू नहीं रुक रहे थे।मानों दोनो केह रहे हो..”बेटा हमारे कलेजे का टुकड़ा तुम्हे सौप रहे हैं,उसका खयाल रखना।”
क्या उस घर में लोग मुझे ऐसा ही प्यार देंगे? क्या वो मेरा इतना खयाल रखेंगे? २..३महीने पहले जिन्हें में जानती तक नहीं थी,क्या वो मेरे अपने बन पाएंगे? मैं तो उन्हें अपना पूरा जीवन समर्पित करने जा रही हूँ।
…….”राजेश और सिमरन अब से तुम दोनों शादी के बंधन में बंध गए!!”
और मेरी विचारों की धारा …एक विशाल सागर में विलीन हो गई… शायद अब उनका अपना कोई अस्तित्व न रहा हो।

✍️शीतल प्रधान देशपांडे

 

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