रागिनी अतुल गुप्ता। (विधा : कविता) (एक दुल्हन के सपने | प्रशंसा पत्र)

रागिनी अतुल गुप्ता। (विधा : कविता) (एक दुल्हन के सपने | प्रशंसा पत्र)

128
2
image

रागिनी अतुल गुप्ता

नववधू बनकर खड़ी हूं
आज नए आंगन में
जाने कैसी उथल पुथल
मची है मन में
जानती हूं मीन मेख भरी नजरें
मुझे परखेगी
और तानों से भरी बातें
कानों में उतरेंगी
सहम जाती हूं सोचकर
बन तो तो पाऊंगी ना
हिस्सा इस आंगन का
बरबस ही भर आती हैं आंखें
जो याद आता चेहरा बाबुल का अचानक से खनक जाता कंगन महसूस होती
नए नए बिछुओ की चुभन कनखियों से जब देखती
चेहरा पिया का
महक उठता तन – मन
अनजान से रिश्तो में
कभी ढूंढती कोई सखा
आईने आईने में निहारती
रूप यह खिला खिला
लजाती ,सकुचाती
उठते ना जाने
क्या क्या ख्वाब मन में
नववधू बनकर खड़ी
आज नए आंगन में ||

स्वरचित
रागिनी अतुल गुप्ता

Leave a Comment

Your email address will not be published.

You may use these HTML tags and attributes:

<a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

×

Hello!

Click on our representatives below to chat on WhatsApp or send us an email to ubi.unitedbyink@gmail.com

× How can I help you?