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रजनी सरदाना। (विधा : कविता) (बर्फीली शामें | प्रशंसा पत्र)

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रजनी सरदाना

फिर सर्द हवाओं ने छेड़ा तराना
फिर इन वादियों, इन पर्वतों ने ओढ़ी सफ़ेद चादर
फिर याद आई संग तेरे बिताई हुई वो बर्फीली शामें
पेड़ों के तनों पर गोदा हुआ नाम तेरा, मेरा
सर्द मौसम में भी खिला गुलाब सा तेरा चेहरा
मानो फूलों ने दे दिया हो अपना रंग रूप तुम्हे
प्रकृति की छठा में तुम भी नहाई हो
भरपूर प्रेम का उपहार लें कर आई हो
कैसे भूलू मैं, उन बर्फीली शामों के वो पल
जो हमने बिताये थे साथ कल
ये फ़िज़ाये, ये वादियाँ,
ये पेड़, ये रास्ते, गवाह है
मैंने सिर्फ़ तुम को ही चाहा है
तुझ से किये कुछ वादे
मैं निभा ना सका
ये तन्हाई,उसकी ही तो सज़ा है
खड़ा हूँ अरमानों की ठण्डी, बेरंग दुनियाँ में,
अपने प्यार की निशानियों को सहेजते हुए
शायद तू फिर मिले मुझे इन्ही वादियों में , इन्ही बर्फीली शामों में कहीं….
स्वरचित
रजनी सरदाना

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