मधुरा लडकत ( समय प्रतियोगिता | युगान्तकारी रचना हेतू प्रशंसा पत्र )

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मधुरा लडकत

घड़ी की सूइयोंपर चलता आज का जीवन कुछ यांत्रिक सा
लगता है,
तसल्ली के दो क्षण मिलना भी मुश्किल सा
लगता है,
जिंदगी की जद्दोजहद में दौड़ रहें हैं सभी जिंदगी को भर-भर कर जीना सपना सा
लगता है,
कुछ क्षण बांधे रखने की ख्वाइश करें तो वक्त हाथों से फिसलती रेत सा
लगता है,
दिल जब ढूंढ लेता है फ़ुरसत के कुछ पल रुक जाएं वक्त वहीं ऐसा
लगता है,
हर घंटे का एहसास कराती घड़ी की टण-टण
ध्यान से सुनो तो ;अभी बहुत कुछ करना है बाकी
लगता है,
कभी जब सुना करते है मंदिर या गिरजाघरों की घंटियां;
शांत,स्तब्ध,एकाग्र मन कहता है कि
यहीं वक्त है ठहर जाने का,
आत्मचिंतन से संमृद्धता पाने का,
जीवन के मकसद को जानने का,
वक्त के इन पलों को भर-भर कर जीने का,
यहीं है सही वक्त ऐसा लगता है।।

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