प्रमोद मूंधड़ा (अँधेरा प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र )

प्रमोद मूंधड़ा (अँधेरा प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र )

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प्रमोद मूंधड़ा

मेरे प्रिय आत्मन ,
तमसो मा ज्योतिर्गमय ~ये प्राचीन काल में ऋषियों द्वारा की गयी और दी गयी प्रार्थना है ! प्रार्थना का उच्चतम रूप और ये प्रार्थना उच्चतम शिखर से उच्चतम संभावना के लिये की गयी प्रार्थना है ! कहता है ऋषि ~ कि हे परमात्मा.. मुझे अंधेरे से उजाले में ले चलो, उजाले में स्थिर कर दो ! आज ये बात हमारी समझ से ताल मेल नहीं खाती कि ये कौन से अंधेरे और उजाले की बात है ~ हम तो उजाले में ही हैं और अब तो चौबीसों घंटे प्रकाश की सुविधा है ! नहीं ~ ऋषि इस प्रकाश की बात ही नहीं करते ! ये प्रकाश तो दिन में सूर्य से होता है और रात में बिजली के साधनों से किया जा सकता है ! इस प्रकाश से तो स्थान और वस्तुएं प्रकाशित होती हैं ~ इस प्रकाश से हमारे प्रकाशित होने का कोई संबंध नहीं जुङता ! इस प्रार्थना से आज के लोगों का ,मनों का संबंध जुङता नहीं मालूम पङता ! जबकि समय की धारा के साथ बदलते मनुष्य के लिये इस प्रार्थना की सार्थकता और बढती जा रही है ! दरअसल कुछ घटनाएं और बातें चाहे अतीत की हो या भविष्य की हो, समय के लंबे अंतराल के कारण हमारी समझ के अनुकूल नहीं बैठती या भरोसे
योग्य नहीं लगती।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ~ ये प्रार्थना शाश्वत है ! लोगों ने पहले भी की थी और आज भी करते हैं ! ये बात हम जो प्रकाश या ज्योति जो अपने आसपास देखते हैं उसकी है ही नहीं ! ये तो ध्यान की ऊँचाई में प्रत्यक्ष देखे गये आलोक की, अपनी आत्मा की ज्योति के उजाले और चमक
की बात है जिसमें ध्यानी मनुष्य साक्षी होकर परम आनंद की अनुभूति करता है और फिर उस अनुभूति से वापस लौटकर परमात्मा से प्रार्थना करता है कि हे परमात्मा मुझे इसी आलोक में , इसी प्रकाश में थिर
कर दो ! इस अनुभूति के बाद उसे फर्क दिखाई पङता है उस दिव्य प्रकाश और इस साधारण प्रकाश के बीच ! उस दिव्य प्रकाश की तुलना में उसे ये प्रकाश ( जिसे हम प्रकाश जानते हैं ) साधारण मालूम पङते
हैं ~ अंधेरे से, तमस से मालूम पङते हैं !
तो ऋषि एक ओर तो प्रार्थना करता है परमात्मा से स्वयं के लिये और दूसरी ओर इशारा करता है ~ औरों के लिये , करुणावश कि एक और ही प्रकाश का ,आलोक का जगत है ~ आओ तुम सब भी इसका अनुभव करो ! ये वास्तविकता है कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर
( आनंद , प्रकाश , सुगंध , स्वाद , श्रवण ) ऐसे अनेक अनुभूतियों के दिव्य केंद्र होते हैं जिनको ध्यान में स्वयं के भीतर प्रवेश करके जाना जा सकता है, सक्रिय किया जा सकता है ! हमारी अनुभूति की बाह्य
इंद्रियों से कहीं ज्यादा सक्षम और दिव्य केंद्र भीतर मौजूद रहते हैं ! और भीतर के केंद्र से ,भीतर की आँख से जिसे दिव्य दृष्टि कहते हैं इस प्रकाश का अनुभव होता है जिसकी बात इस प्रार्थना में है ! और ये प्रत्येक मनुष्य के लिये संभव है प्रत्येक मनुष्य में ये क्षमतायें ,संभावनाएं जन्म के साथ ही होती हैं मगर इन केंद्रों को सक्रिय करने के लिये प्रयास
करना होता है ! उसी प्रयास का मार्ग ध्यान है,मौन है ,स्वयं में प्रवेश है !

जीवन की आपाधापी में हमें अपनी ही दिव्यता का दिव्य संभावनाओं का विस्मरण हो जाता है ! कहते हम सभी हैं कि परमात्मा सबके भीतर मौजूद है मगर इस स्वयं के भीतर मौजूद परमात्मा को ,आत्मा
को जानने का प्रयास बहुत कम लोग ही करते हैं ! काश हम सभी अपनी दिव्यता को जानने का प्रयास करें तो जीवन की पुलक और महक कुछ और ही हो जाये और जीवन तनाव, बेचैनी ,अशांति के अंधेरे से
निकल कर आनंद के प्रकाश में आलोकित हो जाये, थिर हो जाये !

आप सभी के हृदय में इस प्रकाश की अभीप्सा जगे और इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास हो ! आपका जीवन इस प्रकाश से आलोकित हो और ये तमसो मा ज्योतिर्गमय ~ आपकी भी प्रार्थना बने !!

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