दिव्य सेठी। (विधा : कविता) (मेरा देश मेरा अभिमान | प्रशंसा पत्र)

दिव्य सेठी। (विधा : कविता) (मेरा देश मेरा अभिमान | प्रशंसा पत्र)

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दिव्य सेठी

देश मेरा इक सोनचिरैया, है विश्वगुरु विख्यात,
अभिमान है के मिला, मुझे इस माटी का साथ ।

युद्ध अनेकों हुए धरा पर, लहू से सींची ये वसुंधरा,
पानीपत हो या कारगिल, हर शूरवीर था डटा रहा ।

शासक हुए अशोका और चंद्रगुप्त से कई यहाँ,
विवेकानंद, माँ टेरेसा से हीरे मोती आँगन उगलता रहा ।

दो सौ वर्षों तक अंग्रेजों के धोखे, गुलामी का विष भारत माँ ने पिया,
लक्ष्मी बाई से भगत सिंह तक सपूतों ने, आज़ादी के लिए बलिदान दिया ।

जीता देश लड़ाई आज़ादी की, सन् सैतालिस में नया हुआ भोर,
गणतंत्र की नींव रखी और देश बढ़ा विकास की ओर ।

अठाइस राज्य और आठ केंद्र शासित प्रदेशों का परिवार मेरा देश,
अनेकता में एकता का विश्व को सदा देता हिंदुस्तान संदेश ।

देश मेरा दुनियाँ में निराला, समृद्धि का भंडार है,
कोस कोस पर बदले संस्कृति और बोली हर बार है ।

धर्म अनेकों पूजे जाते, बिना भेद के एक समान,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, देते भाईचारे का प्रमाण ।

रमन, भाभा, रामानुजन से वैज्ञानिकों ने की खोज कई,
ध्यानचंद, कपिलदेव, पी टी उषा से खिलाड़ियों ने दी खेल जगत को ऊँचाई नई ।

असम की चाय या सेलम की हल्दी, जुहू की चौपाटी या कश्मीर की वादी,
पहनावा रहा धोती और साड़ी, धागा रेशमी हो या हो चरखे का खादी ।

ताज महल से कतुब मीनार, हम्पी से सारनाथ तक,
राम सेतु से हिमालय, मेरा भारत महान, है ना इसमें कोई शक ।

भारत माता का करता हूँ सदैव मैं यश गान,
जन्म यहीं और मरण यहीं, है मेरा देश मेरा अभिमान ।

-दिव्य सेठी

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