डॉ. हरविंदर सिंह गाँधी । (विधा : कविता) (एक पैगाम पिता के नाम | सम्मान पत्र)

डॉ. हरविंदर सिंह गाँधी । (विधा : कविता) (एक पैगाम पिता के नाम | सम्मान पत्र)

87
(No Ratings Yet)
image

डॉ. हरविंदर सिंह गाँधी

हर एक पिता में, समझो तो, थोड़ी सी माँ भी होती है
वो पालन पोषण करता है , माँ जिस फ़सल को बोती है

शिशु के घर में आते ही , वो ज़िम्मेदार बन जाता है
खाना ख़ुद लाता हो पर , सबसे आखिर में खाता है
चंद दिनों में , लड़के से वो , एक पुरूष बन जाता है
कहीं कहीं विचरण करता था , समय से अब घर आता है
परिवार की ख़ुशियों को वो , ख़ुद के दर्द भुलाता है
खा थपेड़े दुनिया के , बच्चों को सुंदर घर बनवाता है
गोवर्धन बन जाता है वो , जब भी बारिश होती है
हर एक पिता में , समझो तो , थोड़ी सी माँ भी होती है

जश्न की तरह मनाता है , वो बच्चों के चलने को
ऊँगली थामे रहता है , लड़खड़ाए तो , सँभलने को
दिन भर मेहनत करता वो , क़िस्मतें उनकी बदलने को
सूरज भी बन जाता है वो , लगे शाम जो ढलने को
ठंडी रातें बन जाता वो , जीवन लगे जो जलने को
हर चीज़ ख़रीद वो लाता है , जो बच्चे लगे मचलने को
तकलीफ़ में गर बच्चा हो कोई , उसकी आँखें रोती हैं
हर एक पिता में , समझो तो , थोड़ी सी माँ भी होती है

किसी बात से बच्चे उसके , मायूस यदि हो जाते हैं
मन बहलाने को बच्चे , बस पिता की गोदी पाते हैं
किस किस जतन से बाप सभी , उनका जी बहलाते हैं
हर दर्द भुला कर दुनिया का , घर में मुस्काते आते हैं
ख़ुद की परेशानी कोई भी , वो घर में नहीं बताते हैं
फिर , बड़े होकर , वही बच्चे , पिता को भूल जाते हैं
बच्चों की याद में उसकी आँखें , फिर पत्थर सी होती हैं
हर एक पिता में, समझो तो , थोड़ी सी माँ भी होती है

डॉ. हरविंदर सिंह गाँधी

Leave a Comment

Your email address will not be published.

You may use these HTML tags and attributes:

<a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

×

Hello!

Click on our representatives below to chat on WhatsApp or send us an email to ubi.unitedbyink@gmail.com

× How can I help you?