आरती मित्तल (2)( समय प्रतियोगिता | युगान्तकारी रचना हेतू प्रशंसा पत्र )

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आरती मित्तल

सुना था वक़्त होता है मरहम
भर देता वो सारे ज़ख्म
कुरेद कर देखा जो इक ज़ख़्मी मन
घाव हरा था अन्तर्मन
वक़्त ने जहां था लगाया मरहम

सुना था वक़्त गमगीन यादों को देता भुला
तन्हाई में जो टटोला एक उदासीन मन
यादों की लहरें हिलकोरे खा रही वहां
वक़्त ने समंदर में था दिया जिन्हें छुपा

सुना था वक़्त देता हर सुलगती आग को बुझा
कुरेद कर देखा जो इक भस्मी दिल
सुलगती चिंगारी इक दिखी वहां
वक़्त ने दबा दी सुलगती आग जहां

क्या वक़्त भर देता सारे ज़ख्म ?
क्या वक़्त देता हर ग़म भुला?

गम को अंतर्मन में छुपाये
वक़्त ही हौसला मन में जगाये
ज़ख्मो में सीने में किये दफन
वक़्त ही सिखाये जीने का चलन

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