आरती मित्तल (UBI उस गली में प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र)

आरती मित्तल (UBI उस गली में प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र)

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आरती मित्तल

छोड़ आए उस गली के सीने में दफन वो नादान बचपन वो अल्लडपन।

छोड़ आए उस गली की रगों में वो मासूमियत हमारी कट्टी अपा से सुलझ जाती थी जब लड़ाई सारी

छोड़ आए उस गली के दामन मे वो हसीन ख्वाब पारियां रहती थी जिनमें चांद तारों के पार

छोड़ आए उस गली के कदमों में कच्ची अक्ल। जब रिश्ते थे पक्के , ना कोई दिखावा ना छल

छोड़ आए उस गली की बाहों में निश्छल प्यार। जब ना थी कोई बनावट ,ना मुकौटे यार

छोड़ आए उस गली के आंचल में वो किस्से कहानी सुनाती थी प्यार से जिनको दादी नानी।

छोड़ आए उस गली में गूंजती वो बेबाक हंसी वो बारिश की मस्ती ,वो कागज़ की कश्ती

काश कुछ लम्हे पोटली में बांध साथ ले आते उन हसीन पलों को खोल फिर जी पाते
सूनी पड़ी है वो गली ,जैसे विधवा की मांग ना रूह है , ना कोई जज्बात

कब खेलेगा बचपन करती है ये फरियाद कब होगी सूनी गली वो फिर से आबाद

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