विश्वयंत्र

विश्वयंत्र

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कैसी  है ये कल्पना निष्ठुर, क्यों रचा  विश्वयंत्र ठाकुर।
चित्रकारी  की बड़ी  चतुर, मानव  हृदय बनाया  आतुर।।

चक्का  लगा  चँद्र-सूरज का, संचालन किया सृष्टि  का,
उर्जा-निद्रा  का  कर प्रबंध,  आगमन  कराया  वृष्टि का।
बो कर प्रेम-ईर्ष्या  बीज, सत्य-असत्य का  फोड़ा अंकूर;
कैसी  है ये कल्पना निष्ठुर, क्यों रचा  विश्वयंत्र  ठाकुर।।

सजीव-निर्जीव  दो  कल-पुर्ज़े,  वृत   को  रखे  गतिमान,
सुख-दु:ख दो स्तम्भ बनाए, दिवाल खड़ी उसपे अभिमान।
मानव लीला  का  लेवे  आनंद, इन्द्रभूमि  पर  बैठ  मयूर;
कैसी  है ये कल्पना निष्ठुर, क्यों रचा विश्वयंत्र  ठाकुर।।

धैर्य-अधैर्य  परिक्षा  को, बिछाया स्त्री – स्वर्ण का  जाल,
नृशंसता कही उत्पन्न हुई  कही  खिला दया  का मृणाल।
आडम्बर – प्रिय बना  संसार, व्यापक हुआ समस्त  ग़रूर;
कैसी  है  ये  कल्पना निष्ठुर, क्यों रचा  विश्वयंत्र ठाकुर।।

बड़ा  प्रपंचमय यंत्र बनाया, प्रेम-अनुराग से  उसे  सजाया,
‘मन’ नाम का शैतान रचा, फिर कहे छद्म सब मोह-माया।
नर्क  का  सुगम  मार्ग बना कर  मोक्ष का फैलाया  कस्तूर;
कैसी  है  ये  कल्पना निष्ठुर, क्यों  रचा विश्वयंत्र  ठाकुर।।
चित्रकारी  की  बड़ी  चतुर, मानव  हृदय   बनाया  आतुर।।

मृणाल – कमल, नाज़ुक, एक कमल की जड़
प्रपंच – छल–कपट से भरा कार्य, छलपूर्ण कार्य।
छद्म – छल, कपट, ढोंग।

आभा….🖋

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