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हेमलता मिश्रा मानवी (UBI धरती माँ प्रतियोगिता | सम्मान पत्र (कविता))

धरती है माता मेरी ,प्रकृति की है दुलारी
माथे धारें पद रज ,महिमा ही गाई है।। १!!

अविनाशी अवनि की, बात ही निराली सखी
युगों युगों पद चिन्ह ,सीने में छिपाई है।। २!!

समय के रथ चढ़, ऋतु बलखाती चली
धरणी दुल्हन नभ ,मंडप सजाई है।। ३!!

प्रवृति औ प्रकृति में, सामंजस्य साध चलें
धरती की आन-बान, शान बन आई है ।। ४!!

हरियाले अंचरा में, अक्षय भंडार छिपे
चंद्र सूर्य जग दानी, झरती जुन्हाई है।।५!!

आराधन करें मात, वैभवी सुधामयी तू
सोलह श्रृंगार तेरे, सृजन समाई है।! 6!!

वसुधा वसुंधरा वो, वसुधैव वसुमती
वाणी विरुदावली वो, वंद-वरदाई है।।7!!

विश्व गुरु भारत की, संस्कृति ही पुल बनी
सरहदों के पार भी, स्नेही धुन गाई है।।8!!

रक्षा करें पेड़ पौधे, बचाएं पर्यावरण
देखें धरा गोद सीता, सावित्री मुस्काई है।। 9!!

उऋण मनुज नहीं, उपकार धरणी के
दोहन क्षरण देख , सृष्टि भी गुस्साई है।।१0!!

अति वृष्टि सूखा बाढ़, भूकंप प्रलय नाद
प्रकृति ने भौंहे जब, अपनी चढ़ाई है।। 11!!

चंद्र सूर्य नभ तारे, धरती के अंग सारे
वंदन स्वीकार करो, “मानवी” ले आई है!!12!!

हेमलता मिश्र मानवी नागपुर

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