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हिना शाइस्ता। (विधा : गीत) (बर्फीली शामें | सम्मान पत्र )

लहू उबाल पे है ज़रा वो सीने में आग सी जलती है
यूंँ कहूं मैं कभी -कभी बर्फी़ली शाम भी सुलगती है
घबराया -घबराया सा आज यहांँ हर बशर लगता है
ना जाने क्यों अजनबी सा मुझे मेरा शहर लगता है
दबी-दबी सी सर्द पत्तियां क्यों झुके-झुके से शजर हैं
किस बोझ तले दबे हैं सभी कौन मुजरिम इनका है
गर्म सांँसों की फूंक से बर्फ़ की वो परत पिघलती है
यूंँ कहूं मैं कभी-कभी बर्फी़ली शाम भी सुलगती है
पंछी वो सारे दुबके पड़े हैं अपने -अपने नशेमन में
कल तक था साथ-साथ जिनका उड़ना दूर गगन में
पंखों को ज़रा -ज़रा झटक परवाज़ इनको करने दो
सरगम पे हक़ है इनका खुलकर गीत गुनगूनाने दो
कु़रबतों का दौर हो रिश्तों में जमी बर्फ़ पिघलती है
यूंँ कहूं मैं कभी- कभी बर्फी़ली शाम भी सुलगती है
हिना शाइस्ता

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