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सुनीता कत्याल। (विधा : लघु कथा) (बर्फीली शामें | प्रशंसा पत्र)

सर्दी की बर्फीली शामें हम दोनों मियां बीबी गर्म कपड़ों से लद कर स्कूटर से ड्राइव पर निकल जाते।घर आ कर रजाई की गर्मी का सुख लेते।परन्तु बच्चों के होने के बाद ये शामें ड्राई फ्रूट, गाजर हलवा,और गर्म छुंकी मटर खाने में बिताई जाने लगी।अब इस उम्र में बर्फीली शामों से डर लगता है।बर्फीली ठंड हड्डियों को भी ठंडा कर जाती है।
ऐसे में याद आती है वो दुखद घटना।
हमारे एक दूर के रिश्तेदार जो देहरादून में कार्यरत थे ।वो मेरे पति के साथ उनके विभाग में थे ।2 दिसंबर सुबह पता चला कि उन को दिल का दौरा पड़ा। मेरे पति पूरे दिन अस्पताल में उनके पास रहे क्योंकि उनके बच्चे बाहर थे और उनकी पत्नी अकेली थीं।शाम को जब मेरे पति घर आए तो मैंने कहा,”मै भी आपके साथ चलती हूं।जब मै आईसीयू में उनको देखने गई तो उन्होंने मुझे पहचान लिया बोले,वाइफ भी आईं है ।और अपने कपड़े ठीक करने लगे।उनकी पत्नी ने उन्हें हिलने और बोलने से मना किया।मै नमस्ते कर बाहर आ गई।मेरे पति मुझे घर छोड़ फिर हॉस्पिटल चले गए।सुबह 5 बजे मेरे पति का फोन आया बोले,आहूजा साहब नहीं रहे।मेरा दिल धक रह गया और कुछ घंटों पहले का दृश्य मेरी आंखो के सामने घूम गया।तब से मुझे ये बर्फीली शामें और दिसंबर का महीना बिल्कुल भी नहीं भाता।
सुनीता कत्याल

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