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सरिता तिवाड़ी ( पारीक )(UBI भीगी पलकें प्रतियोगिता | सम्मान पत्र (कविता))

वो झील सी गहरी आँखे भीगी पलकें
जिनमें उमड़ रहा था एक सैलाब
अंतर्मन की वेदना को
झकझौर देनें वाला
क्रंदन।
मैं बौझ अपनों के लिए
याद आया बेटे का वो
पहला लड़खड़ाता कदम
जब वो गिरते गिरते बचा लेकर
मेरी बाहों का सहारा,
देख उसकी डगमग चाल
ख़ुशी से भीग गई ये पलकें
दौड़ चला वो जिंदगी की राहपर
छूने अम्बर का विस्तार
देख उसकी कामयाबी
आँखों से बही खुशियों की धार।
फिर संजोयें मैंने भी कुछ सपने
बितेगा मेरा बुढ़ापा मेरे नन्हे मुन्नों की अठखेलियों के संग
लौट आएगा फिर मेरे बचपन का सुनहरा रंग ।
टूट गया ये सपना एक ही पल में
जब मैंने देखा उसका हाथ
मेरे साथ वृद्धाश्रम के द्वार
और भीगी पलकों से निकल पड़ी अंश्रुधार।

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