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सरिता तिवाडी (पारीक ) (अँधेरा प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र )

अरे कमला ये चोट कैसे लगी तुझे ? मेरा ये प्रश्न सुनकर कमला रोने लगी और रुंधे गले से बोली …..मालकिन कल फिर मुन्नी के पापा ने शराब पीकर खूब मारा मुझे ।और जो पैसे आपसे लेकर मुन्नी के स्कूल में एडमिशन के लिए छुपाकर रखे थे मैंने वो भी छीन लिए मैंने जब देने से मना किया तो मुन्नी की भी पिटाई करने लगे …
मैन उसे समझाया …ऐसा कब तक चलेगा तुम कब तक ये सब बर्दास्त करती रहोगी उस शराबी को छोड़ क्यों नही देती ? वो बोली नही मालकिन मैं ऐसा नही कर सकती मैं तो सात फेरों के वचन निभा रही हूं जो मैंने अग्नि को साक्षी मानकर लिए थे । मैंने कहा अरे ये सब बातें किताबो और कहानियों में अच्छी लगती है । तुम अपना नही अपनी बच्ची का सोचो ! उसका भविष्य क्यों अंधेरे में धकेल रही हो ? वो इंसान इस बच्ची के साथ शराब और पैसे के लिए कुछ भी कर सकता हैं ।वो बोली नही मालकिन जैसे भी हैं वो है तो मेरे पति ।
कमला अपना काम करके घर चली गई । मैं ऑफिस का काम कर रही थी पर मन नही लगा उसमे । सिर्फ कानों में कमला के शब्द गूंज रहे थे … ये कैसे फेरे ? कैसे वचन..? क्या इन सबको निभाने की जिम्मेदारी एक औरत ने ही ले रखी हैं …? अचानक मोबाइल की घण्टी बजी देखा तो इतनी रात को कमला का फोन !कैसे …जैसे ही मैंने फोन उठाया कमला रोते हुए बोली मालकिन आप जल्दी से अस्पताल पहुंच जाओ मुन्नी के पापा की तबियत बहुत खराब हैं । मैं तुरतं अस्पताल पहुंची तो पता चला कि अत्यधिक शराब पीने के कारण इनका लिवर खराब हो गया है। स्थिति एक दम नाजुक हैं….कुछ देर उपचार के दौरान कमला के पति ने अंतिम सांसे ले ली और ये सुनकर कमला मुझसे लिपट कर जोर जोर से रोने लगी मालकिन मैं अब क्या करूँगी मेरा ओर मेरी बच्ची का क्या होगा । हमारा तो जीवन अंधेरे में चला गया…. मैं उसे हिम्मत बंधा रही थी और मन ही मन ये सवाल जहन में उठ रहा था कि इसकी जिंदगी में क्या उस शराबी के जाने से वास्तव में अंधेरा हुआ है या उजाले के दिन आ गए है…

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