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रूप जाल

#UBI #Valentinesday

आज जब पूनम की रात आई
उनके चेहरे पर लिखने की बात आई
तो मन में सवाल ही सवाल है
लेखनी का कुछ ऐसा हाल है
कि पड़ गई ख्याल में
खुद ही घिर गई सवाल में
नयनों के सवाल पर
है रात की मजाल क्या
रात की भी कालिमा
लज्जित है आंख पर
जुल्फों के अंधेरे में
खो गया है चांद भी
बादलों की दांव भी
अब लगी है साख पर।
पर्वतों में होड़ है
नाक के सवाल पर
चांद की भी चांदनी
हो गई है छुई मुई
सितारों की रोशनी
चकित है गाल पर।
ललाट के आकाश पर
बिंदिया सूर्य सा चमक रही
और मुसकराहटों में
है दामिनी दमक रही।
तरबतर अधर के आगे
फीके हैं रस सारे
समुंदर के सीप सारे
हतप्रभ मोतियों से दंत पर
हीन भाव से हूक रही
कोयल भी गोरी के कंठ पर।
वाणी में नासिका ध्वनि के आभास पर
गुड़ का भी दर्प चूर, कंठ के मिठास पर
बेवश हुआ रूप भी रूप के सवाल पर
लज्जित है धूप भी तेज बेमिसाल पर
क्या लिखे क्या छोड़ दे
घिर गया संसार भी अब इस सवाल में
कलम की मजाल क्या जो चल पड़े
वो खुद ही है फँस चुकी उनके
रूप जाल में।।

अरुण प्रकाश सिंह

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