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रागिनी अतुल गुप्ता। (विधा : कविता) (एक दुल्हन के सपने | प्रशंसा पत्र)

नववधू बनकर खड़ी हूं
आज नए आंगन में
जाने कैसी उथल पुथल
मची है मन में
जानती हूं मीन मेख भरी नजरें
मुझे परखेगी
और तानों से भरी बातें
कानों में उतरेंगी
सहम जाती हूं सोचकर
बन तो तो पाऊंगी ना
हिस्सा इस आंगन का
बरबस ही भर आती हैं आंखें
जो याद आता चेहरा बाबुल का अचानक से खनक जाता कंगन महसूस होती
नए नए बिछुओ की चुभन कनखियों से जब देखती
चेहरा पिया का
महक उठता तन – मन
अनजान से रिश्तो में
कभी ढूंढती कोई सखा
आईने आईने में निहारती
रूप यह खिला खिला
लजाती ,सकुचाती
उठते ना जाने
क्या क्या ख्वाब मन में
नववधू बनकर खड़ी
आज नए आंगन में ||

स्वरचित
रागिनी अतुल गुप्ता

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