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मौन की महिमा

मेरे .. प्रिय आत्मन् ..
इस जीवन की यात्रा में हम उन्हीं अनुभवों को फिर फिर पाना चाहते हैं
जो हमें प्रीतिकर लगते हैं .. या जिनसे सुख का थोड़ा या अधिक आभास
होता है .. चाहे वो क्षणिक ही हो ! और जिन अनुभवों का हमें पता नहीं
हो .. चाहे वो कितने ही श्रेष्ठ हों , हितकारी हों ~ हम उनकी चाह नहीं करते
और हम ये जान भी नहीं पाते कि हम उन्हें चूक रहे हैं ! बच्चों को आइसक्रीम
अति प्रिय होती है .. पर जरा सोचें ~ एक बच्चा पहली बार आइसक्रीम की
माँग कब करता है ? उसे एक बार चख लेने के बाद .. उसके स्वाद का एक
बार अनुभव करने के बाद ! जब तक बच्चा उसे पहली बार नहीं खाता है ..
तब तक आइसक्रीम की माँग भी नहीं करता है और ना ही उसकी कमी को
महसूस करता है !

आज के समय में अत्यधिक शोरगुल , कोलाहल के कारण और स्वयं को
किसी न किसी काम में उलझाये रखने की आदत के कारण अधिकतर
मनुष्य मौन के .. शांति के .. मन की निर्विचार अवस्था के अनुभव को जान
ही नहीं पाते ! हर समय किसी न किसी काम में .. या बातचीत में या टीवी ,
मोबाइल , अखबार इत्यादि में प्रत्येक मनुष्य इतना लिप्त हो गया है ~ कि
मौन का या अंतस की शांति के आनंद का अनुभव ही विस्मृत हो गया है ..
या .. कभी उसका अनुभव किया ही नहीं ! मनुष्य आनंद को पाने के लिये
सदा आतुर रहता है .. पर आनंद को पाने के लिये बाहरी वस्तुओं की प्राप्ति
की तृष्णा में इतना उलझ गया है .. कि अपने ही अंतस के जगत को भूल सा
गया है ! जीवन में आनंद की वृद्धि के लिये अधिक से अधिक संग्रह करने की
वृत्ति बन गयी है ~ यहाँ तक कि परमात्मा तक की तलाश भी सिर्फ बाहर
के जगत में करता है .. और उपलब्ध होती है कोई तस्वीर या कोई मूर्ति ~
परमात्मा की जीवंत अनुभूति नहीं ! बाहर के जगत में जितना प्रयास किया
जाता है .. उससे कहीं कम प्रयास में सहज रूप से परमात्मा की अनुभूति
हो सकती है ~ अंतस के जगत में .. स्वयं के मौन में .. मन की निर्विचार
अवस्था में ! हमारा जीवन .. हमारा मन इतने शोरगुल और विचारों की भीड़
से भरा रहता है .. कि हमें परमात्मा निकटता का अहसास ही नही होता !
हालांकि कहते हम सब यही है .. कि परमात्मा हमारे हृदय में बसा है .. पर
हमने परमात्मा को मान लिया है दूर कहीं ऊपर आकाश में ( ऊपरवाला )
या मंदिर में .. तीर्थ में ! पर जिन्होंने स्वयं के मौन के जगत में प्रवेश किया ..
उन्होंने सदा ही परमात्मा को पास ही पाया ~ पास से भी पास पाया ! ऐसे
लोगों ने ही कहा .. कण कण में भगवान ! बाहर के कोलाहल से भीतर के
मौन में प्रवेश हो .. तो भीतर छिपे ओंकार का अनाहत नाद प्रकट हो ! सिर्फ
होठों से किये हुए ओम के उच्चार से नहीं .. वरन् चित्त की निर्विचार अवस्था
में .. हृदय के मौन में .. अनायास ओंकार का अनाहत नाद प्रस्फुटित होता है
और तब समझ में आता है ॐ का वास्तविक अर्थ ! अंतस्तल की गहराइयों
में आध्यात्मिक ऊँचाइयों की अनुभूति होती है .. और तब अनुभूति होती है
जीवन के सतत सहज आनंद की , स्वास्थ्य ~ यानि स्वयं में स्थित होने की
स्थिति की , ओंकार के परम् संगीत की , समाधि के दिव्यतम अनुभव की !
और यदि इन सब का जीवन में एक बार भी अनुभव नहीं हुआ .. तो जीवन
की यात्रा बिना इस परम् अनुभव के पूर्ण हो जायेगी .. और ये खयाल में ही
नहीं आएगा .. कि जीवन के इस अवसर में महाजीवन से चूक गये , जीवन
की परम् सम्भावना से चूक गए ! बुढ़ापे में सिर्फ अफसोस रह जाता है .. कि
जीवन खाली रह गया .. कुछ पाना था मगर पा न सके .. कुछ करना था
जो कर ना सके .. और इस अतृप्ति में ही मृत्यु की घटना घट जाती है !

प्रत्येक उस मनुष्य को .. जिसे वास्तविक शांति का , आनंद का अनुभव
करना है ~ उसे गहन मौन का , चित्त की निस्तरंग अवस्था के अनुभव
का प्रयास करना ही चाहिए ! और ये अत्यंत सहज और संभव है ! दिन में
घण्टा आधा घण्टा मौन में रहें .. कुछ भी ना करें .. न शरीर से .. न मन से !
अक्रिया की स्थिति का अभ्यास करें ! ये शुरुआत में प्रीतिकर न लगे .. तो
आधा घण्टा चुपचाप बैठकर या लेटकर अपनी साँस का .. आती जाती साँस
का भीतर ही निरीक्षण करें ! कुछ ही दिनों में अभ्यास सध जायेगा .. आपका
और मौन का सामंजस्य बैठ जायेगा ! एक बार अनुभव से गुजरें तो आप
स्वयं ही पा सकते हैं अपने स्वयं के भीतर मौजूद आनंद के स्रोत को !

पास से भी पास है ~ उसका चमन .. ऐ मेरे दोस्त ..
हो सको जो कुछ घड़ी ~ तुम भी अ..मन ऐ मेरे दोस्त .. !!

मेरी बातों को सुना, पढ़ा .. इसके लिये अनुगृहीत हूँ ! आप सभी के
जीवन में आनंद की अभिवृद्धि हो .. !!

By प्रमोद मूंधड़ा

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2 Comments

  • 0

    True lines ..I am totally agree with it .. amazing and effective message ..🤟🙏🙏

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    वाह भाई साहब परमात्व के परम तत्व की प्राप्ति के सबसे सुगम उपाय आमजन को बतलाकर उस सम्पूर्ण जगत चराचर के स्वामी के ऐकाकार होने का इतना सुलभ पथ बतलाकर सभी मानव जीवन को धन्य कर दिया।
    साधुवाद आपको।प्रणाम

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