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भावना शर्मा। (विधा : लघुकथा) (काल करे सो आज कर, आज करे सो अब | प्रशंसा पत्र)

सुरभि जल्दी जल्दी खाना पैक कर रही थी।कहीं देर ना हो जाये।सुबह का समय वैसे भी बहुत भागदौड़ भरा होता हैऔर इस नीति से जरा भी मदद नहीं मिलती।पर मेरा तो छोड़ो वो अपना भी कोई काम नहीं करती।अभी तक सो रही है,झुंझला कर उसने आवाज लगाई’नीति….नीति’पर नीति नहीं उठी।गुस्से में सुरभि ने दरवाजा जोर से खटखटाया,दो चार मिनट बाद नीति ने दरवाजा खोल कर गुस्से मे पूछा’क्या है?’सुरभि ने कहा’तीन दिन बाद इन्टरव्यू है” ‘तो आनलाइन है,क्या करना है।’नीति ने भी तुनककर कहा।’अरे !कालेज से डाक्यूमेंट वेरिफिकेशन कराना है ना।आज करा कर लाना।’सुरभि ने याद दिलाया।’मैं करवा दूंगी,आप चिंता ना करें’कहकर नीति ने धड़ाम से दरवाजा बन्द कर दिया। सुरभि गुस्सा पीकर आफिस चली गयी।शाम को नीति को पूछा तो उसने कहा अभी दो दिन है ना मैं देख लूंगी।बात वहीं अटक गयी।अगले दिन सुरभि जल्दी उठ गयी पर तेज बारिश के कारण आफिस जा ही नहीं पायी,उसके अगले दिन भी यही हाल रहा,बाहर निकलना मुश्किल हो गया।सब ओर पानी ही पानी था।नीति सुबह से ही बारिश रुकने की राह देखती रही।ना कुछ खाया,अब कल क्या होगा? सोचती रही।दोपहर की उदासी शाम होते होते पछतावे मे बदल गयी।उसकी आँखों से आंसू टपकने लगे।वह सुरभि से लिपट गयी।अब क्या करुं? तो सुरभि ने कहा ‘मैं तो कब से कह रही हूँ,कराना चाहिए था ना’ सॉरी मम्मी!डाक्यूमेंट दिखाने थे, मेरा सलेक्शन हो जाता,मैंने गलती कर दी, अब क्या करुं?’कहकर नीति जोर जोर से रोने लगी।सुरभि उठकर अंदर गयी और एक पैकेट लाकर उसे थमा दिया।आश्चर्य से भर कर नीति ने उसे खोलकर देखा तो खुशी से चिल्ला उठी’ओ मम्मी!ये आपने कब किया? थैंक्यू सो मच ‘नीति झूम उठी तो सुरभि ने उसके गाल पर हल्की सी चपत मार कर बोला अब गांठ बांध ले कि ‘ काल करे सो आज कर ,आज करे सो अब”पल मे परलय होयगो बहुरि करेगो कब’नीति ने चिल्लाकर पूरा किया।
भावना शर्मा

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