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प्रमोद मूँधड़ा (2) ( समय प्रतियोगिता | युगान्तकारी रचना हेतू प्रशंसा पत्र )

मैंने .. हर रोज .. जमाने को .. रंग बदलते देखा है ….
उम्र के साथ .. जिंदगी को .. ढंग बदलते देखा है .. !!

वो .. जो चलते थे .. तो शेर के चलने का .. होता था गुमान ..
उनको भी .. पाँव उठाने के लिए .. सहारे को तरसते देखा है !!

जिनकी .. नजरों की .. चमक देख .. सहम जाते थे लोग ..
उन्ही .. नजरों को .. बरसात .. की तरह ~~ रोते देखा है .. !!

जिनके .. हाथों के .. जरा से .. इशारे से .. टूट जाते थे ..पत्थर ..
उन्ही .. हाथों को .. पत्तों की तरह .. थर थर काँपते देखा है .. !!

जिनकी आवाज़ से कभी .. बिजली के कड़कने का .. होता था भरम ..
उनके .. होठों पर भी .. जबरन .. चुप्पी का ताला .. लगा देखा है .. !!

ये जवानी .. ये ताकत .. ये दौलत ~~ सब ख़ुदा की .. इनायत है ..
इनके .. रहते हुए भी .. इंसान को ~~ बेजान हुआ देखा है … !!

वक्त ले आता .. मौत के किनारे तो .. छिन जाते धन,भवन .. सभी से सारे ..
सब जानते हैं ..फिर भी इनकी खातिर ..आत्मा तक को ..गँवाते देखा है ..!!

वो .. जो ता-उम्र चढ़े रहते थे .. अपने अहंकारों के .. सिंहासन पर ..
उनको भी .. चंद लकड़ियों के तले .. राख में .. तब्दील हुआ देखा है ..!!

उलझे रहते हैं लोग .. जिंदगी भर .. कुछ न कुछ जीतने की चाहत में ..
उम्र के एक दौर में .. सब सिकंदरों को .. अक्सर पछताते हुए ही देखा है ..!!

अपने .. आज पर .. इतना ना .. इतराना ~~ मेरे .. युवा यारों ..
वक्त की धारा में .. अच्छे अच्छों को ~~ मजबूर हुआ देखा है .. !!

जीवन के .. कुरुक्षेत्र में .. योद्धा तो .. सभी होते हैं लेकिन ..
सारथी .. कृष्ण को बनाते .. बस .. किसी किसी को देखा है ..!!

कुछ इस तरह के .. होश .. और अंदाज से .. जीना मेरे यारों ..
कहे जमाना कि .. असल में .. जीते हुए तो .. इसी को देखा है ..!!

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