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निशा टंडन। (विधा : कविता) (बर्फीली शामें | सम्मान पत्र )

दूर तलक बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों की तस्वीर मेरी निगाहों में क़ैद है
और उसका हर कतरा मख़मली रुई सा सफ़ेद है
इस सन्नाटे में मीलों तक कोई शख़्स नज़र नहीं आता
और मन में अजीब सी कश्मकश और खुद से ही जद्दोजहद है
रूह तक उतर गई मेरे, इस मनमोहक नज़ारे की छवि
और हर ज़रूरी काम उस लम्हे के लिए कर दिया हमने मुल्तवी
एकांत में बिताया कुछ वक्त साथ तेरी यादों के
क्यूँकि खामोशी के उस आलम में दूर-दूर तक था कोई नहीं
हाथ में गर्म चाय का कप ले कर से देर तक मैं दरीचे पर खड़ी रही
और मंत्रमुग्ध होकर इस सौंदर्य को मैं एकटक निहारती रही
एक सर्द हवा का झोंका जब झूम कर चला आया पास मेरे
तो तेरी यादों के कारवाँ में मैं एकदम सिमट सी गई
ये मंज़र एक हसीन ख़्वाब सा मुझे फिर लगने लगा
आँख मूँदी तो वो लम्हा मेरे लिए जैसे वहीं ठहर गया
और सूरज की मद्धम किरणें जब बर्फ़ की चादर पर पड़ी
तो इस मधुर मिलन से शरमा कर जैसे वो भी पिघल सी गई
पत्तों पर ठहरी हुई बर्फ़ से पेड़ की टहनियाँ को झुके देखा मैंने
एक सिहरन मेरे बदन में बिजली सी फिर दौड़ गई
कुछ देर बैठ कर हाथ सेंक लिए मैंने
फिर आग की लपटे बहुत देर तक तनहा मचलती रही
ये बर्फीली शामें अक्सर तनहा यूँ ही बीत जाती हैं
और तेरी याद कई मर्तबा हल्के से छू कर मेरे क़रीब से गुज़र जाती है
आँखों से बरसती हैं फिर सुर्ख़ गालों पर आँसुओं की लड़ी
और धीरे-धीरे तेरी यादें वक्त की परतों में ओझल हो जाती हैं
निशा टंडन

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