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डॉ. श्वेता प्रकाश कुकरेजा। (विधा : लघुकथा) (मेरा पहला प्यार | सम्मान पत्र)

आगरा जंक्शन से मैंने ट्रैन पकड़ी तो देखा सामने वाली सीट पर एक उम्रदराज दंपति बैठे थे।उनकी नोंकझोंक सुन बड़ा मज़ा आ रहा था।

“सुंदर मास्क पहने रहो, हम लोगों के बीच है ध्यान रखो।”

“अरे तुम्हारे साथ हूँ न..कुछ न होगा मुझे।”

“उफ्फ कभी तो सीरियस हुआ करो।”कह आंटी ऊपर वाली सीट पर लेट गयी।

मुझे मुस्कुराते देख अंकल भी मुस्कुरा दिए और अपनी ओर आने का इशारा किया।मैं भी उनके पास आ गया।

“ऑन्टी आपको खूब कंट्रोल करती है।”मैंने उन्हें छेड़ते हुए कहा।

“अरे असल में मैं खुद को कंट्रोल होने देता हूँ।और क्यों न करूं किस्मत की लकीरों से चुराया है उसे।”अंकल भी हँसते हुए बोले।

“क्या मतलब अंकल?”

“देखो भई अगर समय है तो बताऊ वैसे भी दिल्ली अभी काफी दूर है।”खिड़की की ओर देखते हुए अंकल बोले।

“जरूर अंकल समय ही समय है,आप शुरू तो करें।”

“मैं बारवीं में था तब मेरी बड़ी बहन के साथ वो अक्सर हमारे घर आती थी।आती और मेरे बाल बिगाड़ देती।मैं पहले तो चिढ़ता पर फिर मैं भी कभी उनकी चोटी खोल देता तो कभी क्लिप निकाल देता।बाल बिगाड़ने के सिलसिले में कब मैं उन्हें चाहने लगा पता ही न चला।उनकी उंगलिया जब मेरे बालों में घूमती,एक्टिवा पर पीछे बैठ जब वो मेरे कंधे पर हाथ रखती…मेरे दिल की धड़कने ही बढ़ जाती।स्कूल से आ बस उनका ही इंतज़ार करता।हमेशा उनके घर दीदी को ले जाने को तैयार रहता।बोर्ड एग्जाम के बाद हर शाम में उनके घर जा उनके साथ शतरंज खेलता।उनके खुले बालों से आती खुशबू मुझे दीवाना कर देती।

उस दिन मेरे प्यार का चमन उजड़ गया जब पता चला कि उनकी शादी होने वाली है।लगा मानो दुनिया ही खत्म हो गयी।उस शाम जब वो घर आई तब मैं अकेला था।

“सुंदर शादी में एक हफ्ते पहले ही तुम मेरे साथ रहने आ जाना,मज़े करेंगे।”कार्ड थमाते हुए वो बोली

“मैं न आऊँगा, कैसे आ जाऊं आपकी शादी में, कैसे देखु अपना पहला प्यार खत्म होते हुए।मैं आपसे प्यार करता हूँ न जाने कब से।”

“पागल हो गए हो क्या,बड़ी हूँ तुमसे।भाई जैसे हो तुम।”बस कह वो चली गयी।

चार साल यूहीं अकेले गुज़र गए उनकी याद में।एक दिन आफिस जाते समय वो मुझे बस स्टॉप पर दिखी।गुमसुम सी अपने ही खयालों में गुम।मैं एक घंटे तक खड़े खड़े बस देखता ही रहा और वो अपनी जगह से टस से मस न हुई।मैंने तुरंत दीदी को बुलाया।दीदी को देख वो रो पड़ी।मैंने न कुछ पूछा बस उन्हें दीदी के साथ घर ले आया।पता चला वो अब अकेली हैं, मैं समझ गया।मेरा पहला प्यार सच्चा था तभी कुदरत ने मुझे एक और मौका दिया है।

कुछ दिन बाद एक रात वो छत पर थी।मैं करीब गया,”मैं आज भी वही खड़ा हूँ जहाँ तब था।मेरा दिल आज भी इंतज़ार कर रहा है।”

“यह मुमकिन नहीं है,बड़ी हूँ तुमसे और अब तो..” वो बोल ही रही थी कि दीदी ने नीचे से गाना चलाया,

“न उम्र की सीमा हो,न जन्म का हो बंधन,जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन..”

और मैंने करीब जाकर उनके बंधे हुए बालों को खोल दिया। और फिर…”

“अब दिल्ली तक सारी कहानी सुना के मानोगे क्या?सो भी जाओ और उसे भी सोने दो।”ऊपर से आंटी की आवाज़ आयी और अंकल ने मुझे आंख मारते हुए कहा,” अब तुम जो आंखों में हो तो नींद कैसे आएगी।”

©डॉ. श्वेता प्रकाश कुकरेजा

 

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