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डॉ आराधना सिंह बुंदेला। (विधा : कविता) (योद्धा | सम्मान पत्र)

चला वो नम आँखों में,यादें लिए ,
मन में दृढ़ता और विश्वास लिए ,
उठा के उम्मीदों का पुलिंदा ,
क़र्ज़ धरती माँ का सिर पर लिए।
ना थके ,ना रुके , ना थमे ,
वो योद्धा वज्र सा सीना लिए ,
फ़ौलाद सा जज़्बा लिए ,
लौह भुजाएँ और तप्त रक्त लिए ।
दुश्मन की आँखें नोच ले ,
बैरी का सीना चीर दे ,
वो शेर जो भीषण गर्जन करे ,
और शत्रु का शीष भेदन करे ।
ना माँ, ना बाप , ना भार्या ,
ना भाई ,ना बंधु, बड़े उसके लिए ,
सबसे पहले है मातृभूमि आगे ,
करता सर्व समर्पण जिसके लिए ।
योद्धा वो है जो हर पल जिए ,
अपनी धरती माँ के लिए ,
हर साँस से निकले वो विजयगान ,
जो माटी में मिलाए दुश्मन की शान ।
करे प्रार्थना हर श्वास उसकी ,
माँ तुम देना आशीष सदा ,
शीष तुम्हारा कभी झुकने ना दूँ ,
देश का वीर योद्धा बनके याद आता रहूँ ।
@ डॉ आराधना सिंह बुंदेला
सर्वाधिकार सुरक्षित
स्वरचित
१५/८/२१
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाइयाँ ।
कविता समर्पित देश के वीर योद्धाओं को ।
🙏

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