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डा. अशोकालरा । (विधा : लघुकथा) (ग्रहण | सम्मान पत्र)

“मुझे बताओ जरा सूर्य ग्रहण कैसे पड़ता है?” सुधा ने अपने पति कमल से पूछा।
“चंद्रमा जब पृथ्वी और सूर्य के मध्य से होकर गुजरता है तो वह सूर्य को कुछ समय के लिए ढँक देता है और पृथ्वी पर उसकी छाया पड़ने से अंधेरा छा जाता है। इसे ही खगोलीय दृष्टि से सूर्य ग्रहण कहते हैं। यह एक विशुद्ध प्राकृतिक घटना होती है। ग्रहण दो प्रकार के होते हैं,” कमल ने ज्ञान दिया।
“लेकिन एक पारिवारिक ग्रहण भी होता है!” सुधा ने कुछ मुस्कुराते हुए कहा।
“अच्छा! अब कमल ने मोबाइल फोन से नज़र उठाई, और उसके व्यंग्य को समझने का प्रयास करने लगा।
“आप पर वही ग्रहण है। पता नहीं कब छंटेगा?” सुधा के स्वर में निराशा उभरी।
“मतलब?” कमल की आँखें चौड़ी हो गईं।
“आप पर आपकी माता जी का ग्रहण लंबे समय से है”।
“बेकार की बातें क्यों कर रही हो?” कमल कुछ नाराज़ हुआ।
“मैंने कल कहा था पिंकी के लिए शंखपुष्पी बूटी ले आना, दिमाग के लिए अच्छी होती है, इसे काढ़ा बना दूँगी”।
“लेकिन माँ ने कहा था, दूध में मुनक्का अच्छी होती है”।
“वही तो मैंने भी कहा। सूर्य ग्रहण तो छँट जाता है, आपका ग्रहण कब छँटेगा? दूध में मुनक्का तो मैं आपको भी देती हूँ”।
—डा.अशोकालरा

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