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कविता–सीमा की परिभाषा

  1. विधा–कविता
    #दिनांक–30/03/2021
    #शीर्षक—“‘सीमा की परिभाषा”‘
    *°°°°°°°’°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°*

    सीमा –में है बंंधा-व्यक्त ,संपूर्ण लौकिक, परस्पर आचार-कारोबार
    मनमानी और अन्याय को लगाम दें, वो अघोषित बंदिश-सारोकार
    अनुशासित है नभ और धरती,जीव-जगत,ब्रम्हाण्ड साक्षात
    ‘अतिशय सर्वेत्र वर्जते ‘के सिद्धांत पर कायम और प्रतिपादित

    सीमा —कोई लकीर नहीं ,अवांक्षित से बचने का सही रूपरेखा है
    मधुर और उपयुक्त भाव को साधने का सहज उपक्रम हैंं
    इन्द्रियों के रमण-समण का बेजोड़ संतुलित तरकीब है
    बुद्धि, विवेक और पराक्रम जागरण का
    दूरदर्शी प्रयोजन है
    जोश-हौसला,उपकार-परमार्थ आंंदोलन का
    सही-सटीक औषधि है

    सारे संत,तपस्वी-ज्ञानी ने, मध्यम मार्ग का बोध कराया
    मर्यादा और आदर्श-मूल्य को सबसे उत्तम पथ दर्शाया
    सनातनी धर्म-आचरण की पूरी अवधारणा
    मनसा-वाचा-कर्मणा की एकनिष्ठ, एकरूपता है..

    जब भी टूटी वर्जनाएं, ध्वस्त हुई मान्यताएं,भंग
    इंसान से इंसान का ,प्रकृति से इंसान के मध्य सरहदें
    नाजुकी रिश्ते की सेहत-सुरत चरमराई, बदहाल हुई
    विध्वंस-विनाश के वार से, शर्मसार मानवता
    घायल प्रकृति, रंजयुक्त विकराल हुई…

    ज्यो पंछी की उन्मुक्त उडान,कवि के कल्पना के समान
    उपमा-उपमानों के पार, प्रखर प्रज्ञा, चेतना-विस्तार
    अंतहीन हर वर्जना पार , जिसका न कोई सीमा-डोर
    सीमा पर डटा सिपाही, नित्य निछावर सीमा पार
    ममता-करूणा भी असीम ,ज्ञान-विज्ञान की नहीं कोई दीवार…

    ————————————————-
    #पूर्णत:मौलिक वं स्वरचित
    @अर्चना श्रीवास्तव, मलेशिया

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