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इरा। (विधा : गीत) (बर्फीली शामें | सम्मान पत्र )

घाटी में वैधव्य छा गया
गीत कोई कैसे गाऊं
नजरबंद कहीं धूप हुई
जमती सांसें कहां पिघलाऊं
घाटी में वैधव्य छा गया…
अपनेपन का ढोंग रचाती
नगर घुसी बर्फीली शाम
सर्द हवा संग यम बन निकली
किस गुदड़ी में प्राण छुपाऊं
घाटी में…..
अपने सम्मोहन में जकड़े
झील, ताल, नदियों की धार
भीतर जल बिन तड़पे मछली
उसको सांसे कैसे पहुचाऊं
घाटी में….
बर्फीली बेड़ी में जकड़ी
देवदार की सारी शाख
उनमें बसते खग के डैने
जमने से मैं कैसे बचाऊं
घाटी में……
कुम्हलाई बर्फीली परतों में
फूलों की कोमल देहें
साथ दबी तितली की रंगत
फिर से कैसे मैं बिखराऊं
घाटी में वैधव्य छा गया…
इरा

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