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आराधना अग्रवाल। (विधा : लघुकथा) (राज़ | सम्मान पत्र)

“कैसी बेशरम औरत है? विधवा है और मां बनने वाली है! पता नहीं, पर सुना है पचास के आसपास की उम्र है शोभा जी की। शादीशुदा बेटी है, उसके ऊपर क्या बीतती होगी? छीः कैसा घोर कलयुग है।

बहू – बेटे बड़ी तीमारदारी करते हैं। अमेरिका से दोनों उसकी देखभाल करने आ गए। “

मोहल्ले के लोगों की इन बातों ने शोभा जी का घर से निकलना मुश्किल कर दिया। लोगों को हैरानी इस बात की है कि बिना किसी शर्म के तीनों पार्क जाते हैं, घर के अंदर से कहकहों की आवाजें आती है मानों सास नहीं, बहू गर्भ से है।

रोजाना एक ट्रेनर आधे घंटे शोभा जी का व्यायाम करवाती है ताकि डिलीवरी नॉर्मल हो। जैसे जैसे बच्चा गर्भ में आकार ले रहा है , वैसे वैसे शोभा जी के चेहरे की थकान उनकी अंदरूनी हालत बयां कर रही है। पर उनके आनंद में कोई कमी नहीं है।

इतने दिन हो गए और बच्चे का पिता कौन है, इस राज पर से पर्दा उठ नहीं रहा। कई तरह की अटकलें लोग लगा रहे हैं, कानाफूसी कर रहे, पर सामने जाकर पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे।

शोभा जी फोन भी नहीं उठा रहीं उन्हें पूर्णतः आराम की हिदायत जो दी गई है।

आज पडोसियों ने देखा शोभा जी को अस्पताल में भर्ती कराने ले जाया गया। ग्यारह दिनों बाद वो घर लौटीं। यह क्या बच्चा कहां है? क्या उम्र दराज होने के कारण बच्चा नहीं रहा?

अब तो किसी से रहा नहीं गया। घंटी बजी और  पड़ोसियों को एक साथ देख घर में सब दंग रह गए। मिसेज शर्मा ने पूछा, ” काफी दिनों से आने की हम सोच रहे थे पर आ नहीं पाए। कैसी रही डिलेवरी? बच्चा कैसा है और कहाँ है?”

शोभा जी ने हाल चाल पूछने के लिए उनका धन्यवाद किया और कहा, “बच्चा स्वस्थ है और मां के साथ है।”

“माँ तो आप है, नहीं? मिसेज अग्रवाल ने कटाक्ष किया।”

“हाँ, पर एक सरोगेट माँ हूँ और बच्चे की अपनी माँ मेरी बेटी है।”

तीन साल हो गए पर बेटी को मां बनने में दिक्कत आ रही थी। सबने उसका हौसला बनाए रखने की कोशिश की पर वह डिप्रेशन में चली गई। तब मैंने यह निर्णय लिया। सब की सहमति तथा ईश्वर की कृपा से आज वो भी एक माँ है।

शोभा जी की बदनामी करने वाले लोगों को सांप सूंघ गया। उस दिन कई लोग अपनी ही नजरों में गिर गए।

आराधना अग्रवाल

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