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आराधना अग्रवाल। (विधा : लघुकथा) (आभासी मित्र | सम्मान पत्र)

पति एवं बच्चों की अति व्यस्तता ने उसे आभासी जगत से जोड़ा। धीरे धीरे कई मित्र जुड़ते गए और वह इस दुनिया में रम गयी। परिवार में किसी को यह फुर्सत नहीं थी कि उसमे आए परिवर्तन को देखते । पहले सबों के पीछे भागती, मनुहार करती, अपने होने का एहसास दिलाने के लिए नया कुछ पकवान बनाया करती, सरप्राइज प्लान किया करती और उनके साथ समय बिताने के लिए उनके फ्री होने का घंटो इन्तज़ार करती।
पर आज खाली समय में मोबाइल पर अपने कई ग्रुपों में खुशियाँ बाँटती और समेटती हैं। इस जगत ने उसे उसके उस पुराने रूप से पुनः परिचित करवा दिया जिस पर मायके वालों को नाज था। उसकी बुद्धिमत्ता, सादगी, बहुआयामी योग्यता, गायन एवं नृत्य कला, उसकी प्रगतिशील सोच और लेखन क्षमता सब कुछ जग उजागर हो गया। घर में किसी ने भी यह नहीं देखा कि  वह एक विशाल परिवार का हिस्सा बन गयी।
उसकी तबीयत अचानक से एक दिन इतनी बिगड़ी की अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टर ने किडनी बदलने की जरूरत बता दी।  मौत के आहट ने सबको झकझोर कर जता दिया कि उसका जीवित रहना कितना जरूरी है। किडनी सभी देना चाह रहे थे पर बात नहीं बनी।
उसने अपनी हालत और जरूरत के विषय में अपने आभासी मित्रों को अवगत किया। आनन फानन में जंगल में लगे आग की तरह बात फैल गई और कुछ ही घंटो में डोनर के फोन आने लगे, प्रार्थनाएं की जाने लगी और एक सप्ताह में उनका ऑपरेशन हो गया, वो स्वस्थ हो गयीं।
जिस स्त्री को सबने पुराने जमाने की कह उसके साथ समय बिताने का प्रयास तक नहीं किया, आज उसी का विस्तार देख सब दंग हैं। अब वह सिर्फ परिवारिक रिश्तों से नहीं पहचानी जाती बल्कि लेखिका, गायिका, नर्तकी और प्रगतिशील विचारक के रूप में प्रसिद्ध हैं। उसे कई सम्मान पत्रों  एवं पुरस्कारों से नवाजा गया। इस आभासी दुनिया ने उसे घर की दहलीज लांघें बिना विश्व प्रसिद्ध कर दिया।
आराधना अग्रवाल

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