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अमृता मल्लिक। (विधा : कविता) (बर्फीली शामें | प्रशंसा पत्र)

आज भी याद आती हैं वो बर्फीली शामें
भट्टी की आग के पास बैठते थे हम सारे भाई और बहनें
दादा-दादी या नाना-नानी के साथ बिताए वो प्यारे पल
आज भी याद हैं, इतने सालो के बाद !
गरम गरम पकोड़े और बड़ो के लिए चाय या कॉफ़ी
मज़ा ही कुछ अलग था एक साथ बैठे गप्पे मारने का !
बीत गए वो बचपन के हरे – भरे दिन
आजकल के बच्चे क्या जाने वोह सुकून या सुरूर!
कभी किताब से या कभी अपनी ज़िन्दगी से
कहानी पड़ के, तो कभी सुना के
दादाजी जब अपने अंदाज़ में बोलते थे
तब हम लोग जैसे सम्मोहित हो जाते थे !
स्कूल के काम जल्दी ही ख़तम करके,
बैठ जाते थे सब उनकी दोलन कुर्सी के पास
बेसब्री से इंतज़ार करते थे, कब शुरू होगी,
रोज़ की कहानी सुनाने का कार्यक्रम !
बिजली चली जाती तो और भी मज़ा
अंधेरे में भूत की कहानी सुनना
भाई-बहन में इतना प्यार इसी वक़्त झलकता
पूरा दिन तो मारपीट और झगड़े में ही बीतता !
हाय रे! वो सुनहरे दिन ! वापस आ जाओ फिर से
सर्दी के मौसम का ये एक अनोखा आनंद था !
आज भी ठण्ड आती है लेकिन समय नहीं रुकता
उस आग की गर्मी बुझ गई है कब की !
©

(अमृता मल्लिक

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