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अनामिका जोशी। (विधा : लघु कथा) (दादी नानी की कहानियाँ | सम्मान पत्र)

अरे!! अपने हल्कू को देखा है, इतनी बड़ी उम्र में इतनी कम उम्र की ब्याहता लेकर आया है ।गांव में कानाफूसी हो रही थी ।सारी बात सुनकर खान का मालिक अपने चाटुकारों के साथ वहां आ पहुँचा ।
ऐ हल्कू!! गांव की परंपरा के अनुसार आज से रोज रात को सुंदरिया को मेरी हवेली भेज देना, नहीं तो कल से काम पर मत आना!!
हल्कू की आंखें फटी रह गई!
घर आकर बोला सुन री!! अब से तुझे भी……….
नहीं!! मैं कहीं नहीं जाने वाली !!
सुनो जी!,,,,, मैं आपके साथ रूखी-सूखी खाऊंगी, जहां रहोगे रह लूंगी, पर मुझे आपके गांव की ये घिनौनी परंपरा स्वीकार नहीं!!!
अरे ,पगला गई है क्या? हमारा जीना हराम हो जाएगा!
कोई जरूरत नहीं है,,, इसके सामने गिड़गिड़ाने की!!!
देखती हूँ तुझे कौन ले जाता है !
बड़ी दादी मां ,,,,,,मुझे अपनी शरण में लेलो ।
हल्कू की दादी जिसने हल्कू के मां-बाप के गुजरने के बाद उसे पाल पोस कर बड़ा किया था जो खुद भी इस घिनौनी परंपरा का शिकार होती आई थी। आज जाने कहां से उसके दिल में सुंदरी के लिए प्यार और ममता जागी।
शहर से एक रिपोर्टर आया हुआ था उनके लिए सोने पर सुहागा था।
सुबह ठेकेदार का आदमी मुनादी करने आया।
कहा-“जो भी बीच में आएगा गोलियों से भून दिया जाएगा “।
वे सुंदरी की ओर बढ़ने लगे। दादी बीच में आकर खड़ी हो गई। बोली -पहले मेरी लाश पर से गुजरना होगा ।
अब से कोई बहू इसकी भेंट नहीं चढ़ेगी!!
तभी रिपोर्टर द्वारा शहर की पुलिस को इत्तला कर दिए जाने से मौके पर पुलिस भी पहुंच गई ।
लेकिन दुखद !!!
पुलिस के पहुंचने से पहले दादी बंदूक की गोलियों की भेंट चढ़ चुकी थी ।सभी के खिलाफ कार्यवाही हुई। खान बंद कर दी गई।
गांव में खुशी का माहौल था ।पहली बार स्त्रियां इस तरह निडर होकर इज्जत के साथ स्वच्छंद घूम सकती थी। यह सब दादी मां की देन थी ।
पर माँ,,,,,,,,, वह सुंदरी थी कौन?
वह मैं थी बेटी!!!
सुंदरी ने अपनी बेटी रीमा से कहा ।
अगर उस वक्त दादी मां ने मेरा साथ नहीं दिया होता तो आज मेरी जिंदगी भी नर्क बन गई होती ।
दोनों दादी की तस्वीर के सामने सजल नेत्रों से देखने लगे।
( स्वरचित )अनामिका जोशी “आस्था”

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